Usha Behen Rajyog Meditation Course Hindi
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BK Usha Behen Rajyog Meditation Course Hindi - Videos
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~Meditation Lesson 1 - Knowing Myself Soul 1 - BK Usha behen
Meditation Lesson 2 - Knowing Myself Soul 2 - BK Usha behen
Meditation Lesson 3 - Knowing God - Supreme Soul 1 - BK Usha behen
Meditation Lesson 4 - Knowing God - Supreme Soul 2 - BK Usha behen
Meditation Lesson 5 - Raja Yoga Meditation 1 - BK Usha behen
Meditation Lesson 6 - Raja Yoga Meditation 2 - BK Usha behen
Meditation Lesson 7 - Karma 1 - BK Usha behen
Meditation Lesson 8 - Karma 2 - BK Usha behen
Meditation Lesson 9 Cycle of Time 1 -BK Usha behen
Meditation Lesson 10 Cycle of Time 2 -BK Usha behen
Meditation Lesson 11 - Powers - BK Usha behen
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Power of future
मनुष्य का वर्तमान जीवन बड़ा अनमोल है क्योंकि अब संगम युग में ही सर्वोत्तम प्रारब्ध बना सकता है और अतुल हीरों -तुल्य कमाई कर सकता है।
राजयोग की निरान्तर अव्यास में मनुष्य को अनेक प्रकार की शक्तिया प्राप्त होती है।इन शक्तियों के द्वारा ही मनुष्य सांसारिक और शारीरिक रूकावट की पार करता हुआ आध्यात्मिक मार्ग की और अग्रसर होती है।
आपका मन जैसे चाहता है आप वैसे ही बनेंगे इसलिए हमेशा अपने आपको रोगी न समझो। अच्छी बनूँगी यह इच्छा कभी भी नही छोड़िये। आपकी पीड़ा जल्दी ही ठीक हो जायेगी, फिर से आपको नया जीवन जरूर मिलेगी। राजयोग की अव्यास से दुःख के लाख तूफान आए तो भी भगवान आपके साथ है,इस भाग्य को देख हर्षित होनी चाहिए। हर साँस में शिव पिता का याद् रहे तो कोई भी बीमारी हो ठीक हो जायेगा।
पुरुसत्तम संगम युग में ज्ञान सागर परमात्मा शिव जो सहेज राजयोग की शिक्षा प्रजापिता ब्रह्मा के द्वारा दे रहे है ,उसे धारण करने से ही मनुष्य इन प्रवल शत्रुओं (5 विकार तथा काम,क्रोध,लोभ,मोह,अहँकार) की जीत सकता है।
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| Revision Course Links | ||
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| Introduction | Day 1 Revision | Day 2 Revision |
| Day 3 Revision | Day 4 Revision | Day 5 Revision |
| Day 6 Revision | Day 7 Revision | Power of future |
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कुछ जीवनोपयोगी समाधान भाग ➡ 03
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राजयोग मेडिटेशन कोर्स :: कुछ जीवनोपयोगी समाधान
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भाग ➡ 03
आपने परमात्मा द्वारा उद्घाटित ज्ञान और राजयोग की जो शिक्षा पाई, हम उसी आधार पर कुछ जीवनोपयोगी जानकारी दे रहे, तो प्रस्तुत है आज तीसरा भाग. ...................
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18 खुशहाल जीवन के लिए क्या करें ?
संसार के सभी लोग खुशहाल जीवन जीना चाहते हैं। यदि आप एक बड़े परिवार का हिस्सा हैं,तो कुछ समस्याएँ आना स्वभाविक हैं।कुछ लोग आपसे इर्ष्या कर सकते हैं या आपके और अन्य के संस्कारों का मिलन नहीं हो पाता आदि। इससे कुछ परिस्थिति भी उत्पन्न हो सकती है परन्तु इसमें याद रखें कि अगर स्वस्थिति श्रेष्ठ होगी तो परिस्थिति अपने आप ही बदल जाएगी।अनुमान लगाने से सावधान रहें, यही एक बुद्धिमान मनुष्य की पहचान है।और एक बुरी स्थिति से सीख भी अवश्य लें।अपनी स्थिति को अचल बनाने हेतु सेवाकेंद्र पर प्रतिदिन ईश्वरीय महावाक्य सुनने अवश्य जाएँ।घर के वातावरण को बदलने के लिए दिन में ५-६ बार पवित्र वाइब्रेशन फैलाएं। बापदादा का आहवान करें। स्वमान का अभ्यास करें जैसेकि मैं आत्मा मास्टर ज्ञानसूर्य हूँ , पवित्रता का फ़रिश्ता हूँ , मास्टर सर्वशाक्तिवान हूँ।एक पावरफुल प्रैक्टिस- घर के सदस्यों को आत्मिक दृष्टि से देखें और संकल्प करें ये सब बहुत अच्छी आत्माएं हैं , मुझे बहुत प्यार करती हैं।
परमात्मा पवित्रता के सागर हैं और उनसे सम्बन्ध भी वही जोड़ सकता है जिसने पवित्र रहने की प्रतिज्ञा ली हो।अगर आप अमृतवेले प्रभु मिलन का आनंद नहीं ले पा रहे हैं तो अपवित्रता इसके पीछे एक सूक्ष्म कारण हो सकता है ।क्योंकि मन में ही गंदगी है इसलिए उसे स्वमान के अभ्यास से पवित्र बनाएं – मैं एक परम पवित्र आत्मा हूँ।रात को सोने से पहले पानी चार्ज करके पीयें , घूमते – फिरते 15 मिनट तक योगाभ्यास करें , पाँच स्वरूपों का अभ्यास करें , स्वमान की प्रैक्टिस करें।सवेरे उठकर नहा-धोकर योग करें।
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19 अतीन्द्रिय सुख की अनुभूति
राजयोग संसार की सब से गुहय्तम विद्या है।इसमें केवल हम परमात्मा को कुछ देर देखते ही नहीं बल्कि उनके साथ रहते हैं।उनके साथ योग लगाने से परमसुख- अतीन्द्रिय सुख की अनुभूति करते हैं। चित्त शांत और संतुष्ट हो जाता है।परन्तु इस विद्या का परम आनंद वही व्यक्ति ले सकता है जो अपने को कुछ नियमों में बांध ले।
दिव्य अनुभवों को प्राप्त करने के लिए कुछ नियम – हमें पवित्रता के मार्ग पर बड़ी strongly चलना होगा।रॉयल मैनर्स धारण करने होंगे। व्यर्थ बातचीत , बहस से बच के रहना है | उचित नींद लेनी है। चुगली करना , शिकायत करना- इन सब बातों का भी परहेज़ रखना है।Time waste नहीं करना है। मुरली कदापि मिस नहीं करनी है ।कुछ देर यज्ञ सेवा भी अवश्य करें।थोड़े शब्दों में बात को रखना है।चार्ट लिखने की भी आदत बनाएं।जो चीज़ें मन को भटकाती हैं उनसे परहेज़ रखें । त्याग वृत्ति को धारण करें।सुक्ष्म पापों से सावधान रहें क्योंकि पापकर्म हमारी शक्तियों को बहुत तेज़ी से ह्रास कर देते हैं। जैसेकि हमारे व्यवहार से दूसरा व्यक्ति दुखी न हो।हमारी दृष्टि अवगुणों की ओर न जाए। हमारा आकर्षण किसी की देह की ओर न हो। किसी की बुराई न करें न सुनें। परचिन्तन न करें।
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20 सहज सफलता और पावरफुल विज़न
हर व्यक्ति सहजतापूर्वक जीवन में सफलता चाहता है।यह एक सुंदर सिद्धांत है कि जो व्यक्ति स्वयं easy है,उसकी हर बात easy हो जाती है।कार्य शुरू करने से पूर्व हम क्या चिंतन कर रहे हैं , उसका प्रभाव हमारे पूरे कर्म पर पड़ता है।किसी भी कार्य को आरम्भ करने से पूर्व शिवबाबा को परमसतगुरु के रूप में याद कर निर्विघनता का , सफलता का वरदान लें।यह महसूस करें की वो मेरे साथ है।विद्यार्थी सुबह छः बजे तक अवश्य उठ जाएँ।जिस विषय में स्वयं को कमज़ोर महसूस करते हों , उनके बारे में विचार करें कि यह तो मेरे favourite हैं , यह तो मुझे आते हैं।इस अभ्यास से subconscious mind बुद्धि में उनके प्रति blockage को खोल देगा।
मनुष्य एक भावुक प्राणी है , जब वह seriously किसी घटना को देख लेता है,तो वो उसके मानसपटल पर गहराई से छप जाती है।उन visions को alter करने हेतु उन्हें हल्का करें , change करें ।हल्की होते – होते वे प्रायः लोप हो जाएँगी। श्रेष्ठ स्मृति द्वारा पास्ट की सभी स्मृतियाँ विस्मृत हो जाती हैं। एक शक्तिशाली आत्मा visions को reflect कर देती है।सुंदर vision लायें तो बुरी vision स्वतः बदल जायेंगी।
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21 परमात्मा को अपना साथी बना लें
आज कई युवा अकेलेपन का शिकार हो रहे हैं। उनके जीवन में सूखेपन के कई कारण हैं- इस उम्र में hormone imbalance से sexual feelings इमर्ज होना , असफल होने पर मित्र और घरवालों की टेड़ी नज़र का सामना न कर पाना आदि।परन्तु वह ये याद रखें की परमात्मा की दृष्टि सभी की ओर प्रेम वाली होती है।इसलिए हम उसको अपना companion बना लें , good friend बना लें , उससे अपने दिल की हर बात share करें। रोज़ मुरली पढकर उस पर अच्छा चिंतन करें और लिखें।सेवाकेंद्र पर जाकर सेवा का कार्य करें।
यदि योग में एकाग्रता नहीं बनती तो सूक्ष्म रीति से observe करें कि मन कहाँ भटक रहा है और फिर अपने से प्रश्न करें कि क्या मुझे यह सोचना चाहिए ? क्या मैं कुछ और श्रेष्ठ चिंतन कर सकता हूँ। ईश्वरीय महावाक्य सुनें।अपने mind को good training दें। ड्रामा के ज्ञान को पक्का कर लें – संकल्प करें की हर आत्मा इस सृष्टि रुपी नाटक में अपना best पार्ट बजा रही है।स्वयं को देह से न्यारा फील करें। एक स्वमान को कुछ दिन तक करें जिससे ब्रेन का damaged portion दोबारा heal हो जाए। अगर visualization न कर पा रहे हों तो कागज़ पर चित्र बनाकर प्रयास करें।
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22 गिरती कला से चढ़ती कला की ओर
सत्यम शिवम् सुन्दरम – सत्यम अर्थात् भगवान सत्य है , शिवम् अर्थात् वह सदा कल्याणकारी है , सुन्दरम अर्थात् उसके जैसा तेज किसी का हो नहीं सकता , वही सर्वोच्च सत्ता है , most beautiful है।प्रभु मिलन एक अलौकिक अनुभव है , उस अलौकिकता में समय की भी अविद्या हो जाती है। मन तृप्त और आनंद विभोर हो जाता है। यह भौतिक विज्ञान का नियम है कि हर प्रक्रिया हमारे चारों ओर के वातावरण को गिरावट की ओर ले जाती है | (all processes occur such that they tend the surroundings towards maximum spontaneity )।इसी रीति से हम आत्माएँ भी जब प्रकृति के साथ इस खेल में आईं तो हमारी भी गिरावट हुई अर्थात् कल कम होती गई।भक्ति की कला भी कम हुई जैसे वो निष्काम नहीं रही , व्यभिचारी हो गयी।आज तो बिल्कुल ही शक्तिहीन हो गयी है। इसलिए इस संपूर्ण गिरावट के समय में जब मनुष्यात्माओं की zero कला हो गयी है तब परमात्मा अवतरित होकर यह सन्देश देते हैं कि मेरे से मन की तार जोड़ तो मेरी शक्तियां तुम में आने लगेंगी।उनकी याद से ही मन pure , बुद्धि दिव्य हो जाती है , अनेक talents विकसित होने लगते हैं।
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23 परमात्मा की प्राप्ति
अब स्वयं परमात्मा इस धरती पर आकर अपना परिचय दे रहें है। जी हाँ, स्वयं योगेश्वर ने ही आकर राजयोग सिखलाया है , उसने ही हमें हमारे रियल स्वरुप का , स्वयं के स्वरुप का , सृष्टि चक्र का ज्ञान दिया है। उसने बताया की वो देहधारी नहीं हैं , जन्म मरण से न्यारे हैं , सूक्ष्म अति सूक्ष्म ज्योति बिंदु हैं। अतः आपको हार्दिक निमंत्रण है कि आइए और उनके द्वारा दिए गए ज्ञान को प्राप्त कीजिये , परमात्मा को जानकार उनसे योग लगाइए। अब तो मन में इसी लग्न की अग्नि को प्रज्जवलित करें कि मुझे तो उसे पाना है। भगवान की आज्ञाओं का पालन करके उनके दिलतख्तनशीन बनना है। ये बात मन से निकाल दें कि लोग क्या कहेंगें ? इतनी श्रेष्ठ प्राप्ति के आगे ये बातें कुछ भी मायने नहीं रखतीं। परमपिता परमात्मा शिव की याद से लौकिक कार्यों की भी उलझनें समाप्त हो जाती हैं , मनोस्थिति श्रेष्ठ हो जाती ,पापकर्म नष्ट हो जाते हैं , उनके अपनेपन की अनुभूति होती है।
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24 कर लो अनुभव प्रभु प्यार का
आज परमात्मा अपनी पहचान स्वयं ही दे रहे हैं। उनका किसी धर्म , जाती , सम्प्रदाय , भाषा के प्रति झुकाव नहीं बल्कि वे तो सभी को अपना बच्चा समझते हैं। सभी उसको प्यारे लगते हैं।इस धरा पर पधारकर उसने अपना प्रेम हम बच्चों पर बरसा दिया है। आज समय की भी यही पुकार है कि अब हमें सब कुछ भूल उसके ही प्यार में डूब जाना चाहिए।भगवान ने हमें पहली फीलिंग ही यह कराई है कि मैं तुम्हारा हूँ। अब हमें इसी स्मृति में रहना चाहिए कि हमने अपनी अंतिम मंजिल को प्राप्त कर लिया है।
धर्मग्रंथों में जो बातें लिखी हुई हैं वह सत्य तो हैं परन्तु मन के निर्बल होने के कारण हम उन्हें धारण नहीं कर पाते। मन की शक्ति हमें परमात्मा के द्वारा ही प्राप्त हो सकती है।परमात्मा से मिलन मनाने का आधार है मन की पवित्रता। हमारे मन में किसी भी प्रकार के संशय के संकल्प न हों।हम अनुशासित प्रणाली से जीवन जीयें , दिव्य गुणों की धारणा करें , व्यर्थ न सोचें , संगदोष से बचें , रोज़ ईश्वरीय महावाक्य सुनें।
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25 अपना हाथ परमात्मा के हाथ में देने द्वारा सुरक्षा का अनुभव
जैसे एक बच्चा अपना हाथ अपने पिता के हाथ में दे सुरक्षित महसूस करता है , उसी तरह अगर हम सभी अपने जीवन की बागडोर अपने परमपिता परमात्मा शिव के हवाले कर देते हैं, यानी उनकी आज्ञाओं का पालन करते हैं, पूर्ण समर्पण कर जीवन जीते हैं तो जीवन की समस्याएँ समस्या नहीं लगती। पूर्ण समर्पण माना सब कुछ तेरा। सूक्ष्म बात यह है कि हमें मैं पन को समर्पित करना है।
विपरीत परस्थितियों में परमात्मा का आह्वान करने से कठिनाई का अनुभव नहीं होता।हम एकाग्रचित्त योगयुक्त होकर विभिन्न योग्यताओं का भी आह्वान कर सकते हैं। इससे विभिन्न योग्यताएँ emerge होने लगतीं हैं और नई विशेषताएँ भी बढने लगती हैं।एकाग्रता की शुरुआत स्वयं को आत्मा देखने से करें और फिर मन के संकल्पों और बुद्धि के तीसरे नेत्र को शिवबाबा पर एकाग्र करें।
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26 खुदा दोस्त से बातचीत
जैसे Prime Minister से बातचीत वही व्यक्ति कर सकता है जो उसके दर्जे का हो वैसे ही परमात्मा से भी वही बातें कर सकता है जो उसके दिल के करीब आ जाए , उससे गहरा नाता जोड़ ले चाहे माँ के रूप में , चाहे पिता के रूप में या मित्र , बच्चे इत्यादि के सम्बन्ध से उसे याद करे। उससे ही अपनी हर बात करे ,यानी उसके लिए वही एक बल एक भरोसा हो। उसके दिल के करीब वही आ पाता है जो संपूर्ण पवित्र बनने का संकल्प मन में रखता है।
जब हमारी बुद्धि व्यर्थ से मुक्त होगी तभी हम उसके द्वारा दिए गए उत्तरों को catch कर सकेंगे।बुद्धि को व्यर्थ से मुक्त रखने के लिए अंतर्मुखी बनना , निश्चिन्त हो जाना, सब कुछ समर्पण भाव से करना , संकल्प भी उसे समर्पित कर देना बेहद आवश्यक है।भगवान भी ऐसे बच्चों की मदद अनेक तरीकों से करने के लिए सदैव तत्पर रहता है।
नोट-हम अगर उसके कार्य में सहयोगी बन जाएं तो वो हमारे कार्यों में सहयोग अवश्य देता है
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ॐ शांति
कुछ जीवनोपयोगी समाधान भाग ➡ 02
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राजयोग मेडिटेशन कोर्स :: कुछ जीवनोपयोगी समाधान
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भाग ➡ 02
आपने आनलाइन रहकर परमात्मा द्वारा उद्घाटित ज्ञान और राजयोग की जो शिक्षा पाई, हम उसी आधार पर कुछ जीवनोपयोगी जानकारी दे रहे, तो प्रस्तुत है आज दूसरा भाग. ...................
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एकाग्रचित्त कैसे बने ?
किसी भी कार्य व्यवहार में एकाग्रता की बहूत महत्वपूर्ण भूमिका है, चाहे वह योग हो या education हो। अकसर यह समस्या कई बच्चों को आती है कि जब वे पढने बैठते हैं तो उनका चित्त एकाग्र नहीं हो पाता और इधर उधर भटकने लगता है ।फ़ालतू चीज़ों की ओर जाने लगता है।इस समस्या को दूर करने के लिए सवेरे उठकर अपने को समझाएं की मेरा ध्यान मेरी पढाई या मेरे कार्य पर ही रहेगा ,आसपास व्यर्थ पर नहीं जाएगा।अवचेतन मन subconscious mind को यह संकल्प भी दें कि मैं आत्मा एकाग्रचित्त हूँ बुद्धिमान हूँ , चरित्रवान हूँ।
योग में एकाग्रता न होने का कारण है छोटी- मोटी गलतियाँ करना ,पापकर्मों का बोझ।योग में एकाग्रता बढाने के लिए दिनभर में छोटी-छोटी ड्रिल्स करते रहें और धीरे- धीरे उनके अवधि को भी बढ़ाते जाएँ।पाँच स्वरूपों का अभ्यास करें यथा:– परमधाम में आत्मा यानी अनादि स्वरुप , सतयुग में देवता यानी आदि स्वरुप , पूज्य स्वरुप , वर्तमान संगमयुग में ब्राह्मण स्वरुप और सूक्ष्मवतन में फ़रिश्ते का स्वरुप। बापदादा का आहवान करें और ये संकल्प करें की उन्होनें अपना वरदानी हाथ मेरे सिर पर रख दिया है।यह याद रखें कि हर एक आत्मा की योग की स्थिति अपनी-अपनी होती है। किसी का योग संगठन में अच्छा लगता है तो किसी का एकांत में , किसी को बैठकर योग में एकाग्रता बनती तो किसी को चलते फिरते।इन अभ्यासों के द्वारा चित्त शांत और मन आनंदित हो जाता है जिससे एकाग्रता में मदद मिलती है।
चमत्कारी मंत्र –" मैं आत्मा मास्टर सर्वशक्तिमान हूँ", "मैं एक महान आत्मा हूँ।"
स्वयं भगवान के द्वारा दिए गए इन स्वमानों के अभ्यास से आपका जीवन संपूर्ण रीति बदल सकता है ।सवेरे उठते ही 108 बार स्वमान लिख लें कि मैं मास्टर सर्वशक्तिमान आत्मा हूँ और सोने से पहले लिख लें मैं एक महान आत्मा हूँ। इनके बारे में संपूर्ण ज्ञान भी अवश्य प्राप्त कर लें कि परमात्मा स्वयं सर्वशक्तिमान है और हमें उसने अपनी सारी शक्तियाँ प्रदान कर दी हैं इसलिए मैं आत्मा मास्टर सर्वशक्तिवान बन गयी हूँ।क्योंकि मैं स्वयं भगवान की संतान हूँ , इसलिए मैं एक महान आत्मा हूँ।इनका sincerely और acceptance के साथ अभ्यास करें।
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पति–पत्नी माना एक-दूसरे के सहयोगी
एक सफल पति-पत्नी की जोड़ी वही है जिसमें एक-दूसरे के बीच समझ और सहयोग की भावना हो।एक पक्ष कोई उपयोगी कार्य करे तो दूसरा पक्ष उसका सहयोग दे।आपस में मोह न हो , expectations कम हों। ·
परिवार में प्यार का आधार है अपनेपन की भावना।परिवार में नई बहू आए तो उसके प्रति यही संकल्प करें कि हमें तो इसे अपने परिवार में समाना है, इस घर की एक और मालिक आई है , कितने समय से हम इस आत्मा का आहवान कर रहे थे।उसे इतना प्रेम दें कि वह सोचे- मुझे तो नए माँ-बाप मिल गए।अपने पुराने घर को तो भूल ही जाए। आप अगर नए परिवार में आई हैं और कुछ परिवर्तन चाहती हैं तो अपनी सहनशक्ति और spiritual power को बढाएं।याद रखें हमारे vibrations दूसरों को बदल सकते हैं।सुबह जल्दी उठकर परिवार के सदस्यों को योग के द्वारा good vibrations दें, उनके प्रति good thoughts emerge करें।शुभ संकल्प करें कि सब कुछ अच्छा ही होगा। इससे उनकी power of realization तेज़ी से काम करने लगेगी। पति -पत्नी का सम्बन्ध बहुत गहरा होता है परन्तु आज इस कलियुग के प्रभाव में ये बहुत नाज़ुक सम्बन्ध बन गया है।इसका मूल कारण है ego clash ।अतः समझदार व्यक्ति वही है जो पहले झुके , अपनी गलती स्वीकार करे ,नम्रतापूर्ण व्यवहार करे। लड़ाई से अधिक झुकाव पर महत्व दे।दूसरे की भावना को ठेस न पहुंचाए । Confusion , debates से बचे। सहयोग शक्ति को बढाये। राजयोग के अभ्यास से आत्मा में उदारता के गुण , boldness के गुण आने लगते हैं। फिर मनुष्य छोटी-मोटी बातों को neglect करने लगता है , वह संबंधों को अधिक महत्व देने लगता है।उसे आत्मा के ज्ञान से अच्छी दृष्टि प्राप्त हो जाती है।
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नींद की समस्या से पाये मुक्ति
आज नींद न आने की समस्या से कई आत्माएं परेशान हैं ।इसका कारण है पूर्व के विकर्मों का खाता जो unconscious mind में बहुत गहराई से छप गया है।रात को सोते वक्त subconscious mind के साथ unconscious mind भी activate हो जाता है और मस्तिष्क को hyperactive बना देता है।मनोविकार, पापकर्म , दूसरों के प्रति बुरी भावनाएं , अंदर में समाया हुआ क्रोध ही अनिद्रा के कारण बन जाते हैं। राजयोग से अनिद्रा का उपचार- सवेरे उठते ही 108 बार लिखें कि मैंआत्मा मास्टर सर्वशक्तिवान हूँ।सोने से पहले इस स्वमान का अभ्यास करें – मैं एक महान आत्मा हूँ ।और फिर संकल्प करें मैं बहुत गहरी नींद में सोने वाली हूँ।इससे subconscious mind को गहरी नींद में सोने का command मिल जाएगा।यह visualization करें कि मुझ आत्मा से किरणें निकल brain में समा रही हैं।जिससे वो relax होता जा रहा है। इसे soul consciousness का अभ्यास कहा जाता है।अपने मन में अपने प्रति श्रेष्ठ संकल्पों का निर्माण करें – जैसेकि मैं एक ज्योतिबिंदु हूँ , मुझमें असीम शक्ति है।परमात्मा के बारे में चिंतन करें कि वो तो ब्रह्मलोक निवासी है , मेरे पिता हैं ।वे ज्ञान के सागर हैं , प्रेम के सागर हैं , शक्तियों के सागर हैं। दुखहर्ता हैं , मुक्तिदाता हैं , सदाशिव हैं।परमात्मा हमारी माँ भी है ।सोते समय संकल्प करें हमारी माँ ( बापदादा ) नीचे आ गयी है | उसकी गोद में सर रख कर सो जाएँ।
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स्वचिन्तन और स्वपरिवर्तन से अन्य आत्माओं में परिवर्तन
कोई पारिवारिक मतभेद के चलते या किसी अन्य कारण से आप दूसरों से परेशान हैं तो सबसे पहले अपने मन से उनके प्रति negativity को हटायें। यदि आप की वे इज्ज़त न करते हों तो भगवान के इन महावाक्यों को याद रखें कि अगर तुम अपने श्रेष्ठ स्वमान में रहेंगे तो सम्मान परछाईं की तरह तुम्हारे पीछे-पीछे आएगा।स्वमान- मैं भगवान की सन्तान एक महान आत्मा हूँ , मास्टर ऑलमाइटी हूँ ।ये( परिवार के सदस्य ) भी महान आत्माएं हैं , मुझे बहुत प्यार करते हैं। उनके प्रति आत्मिक दृष्टि बना लें।एकांत मैं बैठ इस विषय पर विचार करें कि अगर वो गलत कर रहे हैं तो मुझे गलत नहीं करना है।Separation के विचारों को postpone करें और उसके बाद आने वाली कठिनाइयों को भी ध्यान में रखें।
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Spiritual Power के अनुभव
जहाँ संसार की हर शक्ति असफल हो जाती है , कुछ भी काम नहीं करता वहाँ भी समस्याएँ spiritual power के द्वारा ठीक की जा सकती हैं , जरुरत है तो मन के विश्वास की। किसी भी समस्या में अपने मन को अशांत न होने दें।विभिन्न युक्तियों द्वारा , सकारात्मक विचारों के द्वारा उसे शांत कर लें।जैसे सोचें कि जो बीज बोया है उसे काटना तो अवश्य पड़ेगा अथवा चाहे जो भी हो मुझे इस समस्या को योग के ज़रिये समाप्त कर ही देना है।अपनी समस्या प्रभु अर्पण करने पर हल्केपन और साक्षीभाव में सहज स्थित रहेंगे।
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शरीर को रोगमुक्त रखने के लिए spiritual power के प्रयोग की विधि :–
एक घंटा समय निश्चित कर 21दिन या 3 मास के लिए शक्तिशाली योगाभ्यास करें।समय निश्चित करने से ब्रेन दिन के उस समय में एक्टिव स्टेज पर आ जाता है। भोजन और पानी को भी charge करें।ब्रेन को हाथों के द्वारा शक्ति प्रदान करना- इस अभ्यास को दिन में दो बार 10-10 मिनट करें।रात को सोने से पहले अच्छे संकल्प करके सोयें।विचारों की deep cleansing करें , क्योंकि खराब संकल्प ही body के cells को ज़हरीला बनाते हैं।प्रकृति को धन्यवाद दें , उसके प्रति नेगेटिव विचार न रखें।
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काम विकार से मुक्ति
सार- अगर दृढ़तापूर्वक संकल्प किया जाए कि मुझे काम वासना के अधीन नहीं होना है , मैंने तो प्रभु मार्ग अपना लिया है , अपने परमपिता की शरण में आ गया हूँ तो इससे बहार निकला जा सकता है।युवाकाल बहुत महत्त्वपूर्ण है , इस समय का सदुपयोग कर युवा अपने जीवन की रूप रेखा को बदल सकते हैं।वासनाओं के कारण ही आज मनुष्य चिङचिङा, depressed हो गया है।उसकी एकाग्रता नष्ट हो गयी है , वे असफलता की ओर ही बङ रहा है।यह बात याद रखें कि अगर माँ – बाप बहुत vicious हैं तो अवश्य ही उनके बच्चों में भी वैसे ही गलत hormones होंगे।
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कुछ सहज उपाय :–
सुबह अमृतवेले के समय उठ प्रकृति में घूमें , श्रेष्ठ एवं सुंदर संकल्पों द्वारा मन को आनंदित करें जैसे कि वाह ! ऐसे समय में जब सब सोये हुए हैं और परमात्म प्यार बरस रहा है और मैं उसका आनंद ले रहा हूँ। एकाग्रता के लिए खींच-तान न करें , concentration पर ध्यान न देकर meditation पर ध्यान दें।संकल्प करें मैं आत्मा हूँ , यह देह अलग है।मैं आत्मा शिव बाबा का बच्चा हूँ , शुद्ध हूँ। अच्छे चिंतन के द्वारा बुरे चिंतन को समाप्त कर दें।कच्चे भोजन पर अधिक ध्यान दें क्योंकि वेह कर्मेन्द्रियों को शांत कर देता है। पवित्र और कम मसालों वाला भोजन ही ग्रहण करें।पांच स्वरूपों के अभ्यास से , स्वमान के अभ्यास द्वारा पास्ट की सभी स्मृतियाँ erase होने लगेंगी।अशुद्धि और शुद्धि का clash नहीं होगा।संगदोष से बचें , रोज़ ईश्वरीय महावाक्य सुनने सेवाकेंद्र पर अवश्य जायें।वहाँ पर सेवा का कार्य कर अपने पुण्य के खाते को जमा करें।
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अपनी तकदीर की तस्वीर को बदल देना
सदा अपने श्रेष्ठ भाग्य के चिंतन में रहें।स्वमान का अभ्यास करें जैसेकि मैं आत्मा बहूत भाग्यवान हूँ , भगवान मुझे मिला है , सफलता मेरे आगे पीछे घूमेगी।अपने भविष्य से ना डरें।सवेरे उठ बाबा को good morning करके संकल्प करें - मेरा गुड टाइम शुरू हो गया है , मैं आत्मा समय की मालिक हूँ , मैं आत्मा प्रकृति की मालिक हूँ।
सुबह और शाम दोनों ही समय ज्वालामुखी योग का अभ्यास करें। सारा दिन इसी स्मृति में रहें की सर्वशाक्तिवान का वरदानी हाथ मेरे सिर पर है। योग के 1 घंटे को 4 भागों में बाँट भी सकते हैं – 15 मिनट गीत सुनें, 15 मिनट के लिए पांच स्वरुप का अभ्यास करें फिर बाबा से बातचीत करें और आखिरी भाग में रूहानी ड्रिल का अभ्यास करें।
परिवार में बच्चों के मनमुटाव या झगड़े आदि से घबराएं नहीं। इनका कारण युवावस्था में hormonal imbalance हो सकता है या कोई पास्ट कर्म।उन्हें पवित्र भोजन दें।सवेरे जल्दी उठ उन्हें योगदान कुछ अच्छे संकल्पों के साथ अवश्य दें जैसेकि तुम तो गुड friends हो आदि। स्वमान में स्थित हो उन्हें प्रेमपूर्वक परस्पर बात करने का आग्रह करें।
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परमपिता की ओर अपने प्यार को divert करें
भगवान ने हमें इस सृष्टि पर enjoy करने के लिए भेजा है, तो हमें हर बात को ऐसा सुंदर स्वरुप दे देना चाहिए जिससे मन आनंदित हो , खुश हो। अपने attitude को बदलना चाहिए , innocent attitude अपनाना चाहिए।जैसेकि – यह संसार एक सुंदर नाटक है , यहाँ सबके अपने-अपने पार्ट निश्चित हैं।हमें इस विशाल नाटक को देख enjoy करना चाहिए। किसी समस्या के आने पर स्वयं को परेशान , tense , चिडचिडा , निराश न करें क्योंकि इससे एक नेगेटिव वातावरण बन जाता है और परिस्थितियाँ और भी भयंकर रूप लेने लगती हैं।
यदि आप विवाहित हैं और अपने जीवन में कुछ बदलाव की उम्मीद करते हैं तो सबसे पहले अपनी ego को चेक करें और उसे down करें।adjust करने का प्रयास करें। अपनी समस्या को सच्चे दिल से प्रभु अर्पण कर दें। इससे आप उनकी सहायता के पात्र बन जायेंगे।सवेरे उठते ही यह संकल्प करें मैं आत्मा मास्टर सर्वाशक्तिवान हूँ , विघ्न – विनाशक हूँ।वो सर्वशक्तिवान है ,उसने मुझे विघ्नों को नष्ट करने की शक्ति प्रदान की है। विघ्न विनाशक भट्टी करें।divorce से व्यक्ति की मानसिक स्थिति पर गहरा प्रभाव पड़ता है और समाज भी इसे सहज स्वीकृति प्रदान नहीं करता है। हमें कदापि ऐसे कदम नहीं उठाने चाहिए कि लोग हमारा उदहारण देकर गलत कार्यों की ओर अग्रसर हों। मनुष्यों से प्रेम का खींचाव कम करने हेतु अपना प्यार परमात्मा की ओर मोड़ लें ।आत्मिक दृष्टि की practice करें। स्वमान के अभ्यास से सुंदर विचारों का बीज बोयें।अभ्यास करें-मैं आत्मा हूँ , इस देह से अलग हूँ ।याद रखें प्रेम निर्मल और पवित्र है , इसमें वासनाओं का कोई स्थान नहीं।
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ॐ शांति
कुछ जीवनोपयोगी समाधान भाग ➡ 01
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राजयोग मेडिटेशन कोर्स :: कुछ जीवनोपयोगी समाधान
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भाग ➡ 01
हमने आनलाइन के इस सात दिवसीय कोर्स में जाना कि आज परमात्मा अपनी पहचान स्वयं ही दे रहे हैं ।उनका किसी धर्म , जाति , सम्प्रदाय , भाषा के प्रति झुकाव नहीं बल्कि वे तो सभी को अपना बच्चा समझते हैं ।सभी उसको प्यारे लगते हैं । इस धरा पर पधारकर उसने अपना प्रेम हम बच्चों पर बरसा दिया है ।आज समय की भी यही पुकार है कि अब हमें सब कुछ भूल उसके ही प्यार में डूब जाना चाहिए ।भगवान ने हमें पहली फीलिंग ही यह कराई है कि मैं तुम्हारा हूँ ।अब हमें इसी स्मृति में रहना चाहिए कि हमने अपनी अंतिम मंजिल को प्राप्त कर लिया है ।
धर्मग्रंथों में जो बातें लिखी हुई हैं वह सत्य तो हैं परन्तु मन के निर्बल होने के कारण हम उन्हें धारण नहीं कर पाते ।मन की शक्ति हमें परमात्मा के द्वारा ही प्राप्त हो सकती है।परमात्मा से मिलन मनाने का आधार है मन की पवित्रता।हमारे मन में किसी भी प्रकार के संशय के संकल्प न हों। हम अनुशासित प्रणाली से जीवन जीयें , दिव्य गुणों की धारणा करें , व्यर्थ न सोचें , संगदोष से बचें , रोज़ ईश्वरीय महावाक्य सुन। आपने आनलाइन रहकर परमात्मा द्वारा उद्घाटित ज्ञान और राजयोग की जो शिक्षा पाई, हम उसी आधार पर कुछ जीवनोपयोगी जानकारी दे रहे. ...................
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1"बातें बड़ी नहीं होती तुम उन्हें सोच - सोच कर बड़ा बना देते हो"
यह स्वयं भगवान के महावाक्य हैं।जब भी कोई बात आये तो ये न सोचें कि यह क्यों आ गयी ,घबराएं नहीं । याद रखें घबराने से विघ्न बुरे तरीके से आपका पीछा करने लगेंगे।अपने को हल्का रखें । ऐसी सोच बना लें कि इन मुसीबतों से, इन विघ्नों से आपकी शक्तियों का विकास हो रहा है । अगर विघ्न अधिक आ रहे हों तो अभ्यास करें , मैं आत्मा विघ्न विनाशक हूँ ।
यदि आप में किसी भी चीज़ का भय हो तो उसे निकलने पर अवश्य ध्यान दें । क्योंकि वह भय आपके sub conscious mind में समाया हुआ है तो उसे निकालने के लिए सवेरे उठते ही संकल्प करें - मैं आत्मा मास्टर सर्वशक्तिवान हूँ , निर्भय हूँ । अपने अंदर ज्ञान का बहुत अच्छा बल भर लें , जैसे मैं तो आत्मा हूँ , अमर हूँ । मैं क्यों मृत्यु से डरूं , मृत्यु तो जैसे इस शरीर रुपी वस्त्र बदलने का नाम है ।
अपनी बुद्धि को तीव्र बनाने के लिए सबसे पहले मन को शांत करने का अभ्यास करें क्योंकि उसे शांत करने से बुद्धि का विकास बहुत तेज़ी से होता है । स्वमान - क्योंकि मैं भगवान की संतान हूँ ,मैं एक महान आत्मा हूँ । इसी रीति से मैं मास्टर सर्वशक्तिवान हूँ । मैं आत्मा विजयी रत्न हूँ , विश्वकल्याणकारी हूँ । मैं एक पवित्र और महान आत्मा हूँ , शिवबाबा पवित्रता के सागर हैं ,उनसे मुझे पवित्र किरणें आ रही हैं । इसी के लिए आधा घंटा रोज़ योगाभ्यास भी करें । इस बात को भी जान लें कि एकाग्रता द्वारा हम नई - नई योग्यताओं का स्वयं में आह्व।न कर सकते हैं ।
अगर आपकी पवित्रता , प्रभु प्राप्ति के मार्ग पर आपके घर वाले विघ्न डाल रहे हों तो दृढता पूर्वक उनका सामना करें । आपके दृढ रहने से वे भी आपका साथ अवश्य देने लगेंगे , याद रखें संगमयुग का यह सुहावना समय फिर दोबारा नहीं आयगा जब स्वयं परमात्मा अवतरित होकर गीता ज्ञान सुना रहे हैं । आप घर में बहुत अच्छी vibrations फैलाएं , सुबह पांच बजे जब वे सो रहे हों तो उनसे मन ही मन बात करें , उन्हें समझाएं। उन्हें पवित्र भोजन बनाकर के खिलायें ।
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2"अवचेतन मन Subconscious Mind की शक्तियों का प्रयोग"
Subconscious Mind मन का एक बहुत ही पावरफुल हिस्सा है। यह सुशुप्त अवस्था में रहता है परन्तु सोते समय highly active स्थिति में आ जाता है। जो संकल्प हम सवेरे उठते ही रचते हैं वह subconscious mind में गहराई से छप जाते हैं और वह हमारे जीवन को deeply affect करते हैं। Subconscious Mind की programming कुछ विशेष संकल्पों द्वारा करनी चाहिए । उदहारण –
1. आप छात्र हैं और किसी विषय में कमज़ोर हैं तो सवेरे उठते ही संकल्प करें कि मैं आत्मा बुद्धिमान हूँ , इस विषय में बड़ी होशियार हूँ ।संकल्पों को बिल्कुल egoless होकर करें।आपकी लिखने की गति यदि कम है तो संकल्प करें कि मैं आत्मा मास्टर ऑलमाइटी अथॉरिटी हूँ , मेरी लिखने की गति बहुत तेज़ है । बुद्धि में सभी शक्तियाँ मौजूद हैं परंतु activated नहीं हैं , subconscious mind बुद्धि की शक्तियों को activate कर देता है ।
2. यदि किसी बिमारी से परेशान हैं तो subconscious mind को इस प्रकार से program करें – रात को सोने से पहले इसी संकल्प को अपना आखरी थॉट बना लें कि मैं आत्मा बिल्कुल ठीक हूँ , healthy हूँ । subconcious mind की high healing power रात को activate हो बिमारी को ठीक करने लग जाएगी ।
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3. खुशी के वाइब्रेशनस से अनेक बीमारियों ठीक
किसी भी छोटी-बढी बीमारी का असर हमारे काम–काज पर, दिनचर्या पर सीधा पड़ता है और जीवन में संघर्ष की स्थिति बन जाती है। इसलिए किसी भी व्यक्ति को चाहिए कि अगर वो बीमार हो जाए तो सबसे पहले अपने चित्त को शांत रखे ।उस बीमारी को स्वीकार कर ले।आशावादी होकर रहे कि सब कुछ ठीक हो जाएगा, अपने सद्विवेक को जागृत करे।अपने स्वभाव को निर्मल और मधुर बनाए ।धैर्यता से अपने कर्मभोग को चुक्तु करे। संकल्प करे कि मैं तो आत्मा हूँ , बीमार तो यह शरीर है , मैं तो एवर healthy हूँ ।जो व्यक्ति bodyless रहने की practice करता है उसे बीमारियों का असर ही नहीं होता है। उसका मन बीमारी में भी शांत रहता है । अगर आप एकाग्रता और visualization का अभ्यास नहीं भी कर पा रहे हों तो कुछ अच्छे संकल्पों का अभ्यास कर सकते हैं जैसेकि मैं peaceful आत्मा हूँ । इस देह से अलग हूँ। अगर संभव हो तो सवेरे उठकर राजयोग का अभ्यास अवश्य करें।
बीमार व्यक्ति के सगे-सम्बन्धी भी स्वयं को सरलचित्त बनाएँ।परमपिता को अपना साथी बनाएँ , उनकी मदद लें , योगयुक्त रह करके उनका आह्वान करें। patient आत्मा को अच्छे बोल बोलें , उसका मनोबल बढाएं।
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4. श्रेष्ठ मनोस्थिति से बदलें परिस्थिति
मनोस्थिति बिगड़ने का कारण है टेंशन करना , ज्यादा सोचना इसलिए अपने मन को किसी बात में उलझने न दें सीधा ध्यान ऊपर ले जाएँ , साक्षीभाव में स्थित हो जाएँ।कोई आलोचना करे ईर्ष्या करे , टाँगे खींचे तो उसकी बात को आगे बढने का साधन बना लें ,यह सोचें की अगर आगे बढना है तो सुनने के लिए तैयार रहना चाहिए।इस बात को ध्यान में रखें की मनोस्थिति बिगड़ने से विवेक शक्ति नष्ट हो जाती है।
भगवानुवाच – अगर हमारी मनोस्थिति श्रेष्ठ होगी तो परिस्थिति अपने आप बदल जाएगी।मनोस्थिति श्रेष्ठ बनाने के सहज उपाय :- सवेरे उठकर शांत मन से अच्छा चिन्तन करें , अच्छे वातावरण में जाएँ। भगवानुवाच- रोज़ सवेरे मैं तुम्हें समस्या का हल देता हूँ ।उठते ही शिव बाबा के स्वरुप पर अपना ध्यान एकाग्र करें। राजयोग के ज्ञान के आगे blackmagic , अन्धविश्वास आदि बहुत निम्नस्तरीय बातें हैं ।अगर आप राजयोग के पथ पर चल रहे हैं तो आप इनसे प्रभावित नहीं हो सकते|
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5. शुभचिंतन और पवित्र भोजन
शिवभगवानुवाच- यदि तुम अच्छा-अच्छा सोचोगे तो अगर तुम्हारे साथ कुछ बुरा भी होने वाला होगा तो वो भी अच्छे में तब्दील हो जाएगा ।तो हमें अच्छे संकल्प ही रचने चाहिए क्योंकि हमारे संकल्पों में क्रिएटिव एनर्जी है ।तो हम जैसे संकल्प रचेंगे वैसे ही जीवन क्रिएट होगा इसलिए ऐसे संकल्प रचें जिससे जीवन में सफलता की छाप लग जाए ।भविष्य की गुड विज़न बनाएं| कुछ क्रिएटिव विचार – मेरा गुड टाइम शुरू हो चुका है , मेरे साथ सब कुछ अच्छा ही होगा, सफलता मेरे कदम चूमेगी। इस जन्म में किसी विशेष भय का कारण हो सकता है कि उसी वजह से पूर्व जन्मों में हमारी मृत्यु हुई हो। उसके लिए गुड vibrations का उपयोग करें जैसेकि महसूस करें शिवबाबा मेरे साथ है , उनसे बातें करें ।स्वमान का अभ्यास करें – मैं आत्मा मास्टर सर्वशाक्तिवान हूँ , विघ्न विनाशक हूँ ।कुछ विशेष Intuitions होने पर यही अभ्यास ५ मिनट एकाग्र होकर करें।
योगी जीवन का एक महत्वपूर्ण स्तम्भहै पवित्र भोजन।ये भगवानुवाच है कि प्याज़ , लहसून मनुष्य में वासनाओं को उत्तेजित करते हैं, यह । तमोप्रधान भोजन है।क्योंकि राजयोग का आधार है ही पवित्रता इसलिए योगी जीवन में इनका सेवन पूर्णतः वर्जित है ।
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6. दृष्टिकोण को बदलना एवं कामजीत बनना
हम अगर अपने दृष्टिकोण को बदल लें तो सारा संसार ही बदल जायेगा।दूसरों के अवगुण देखने से ख़ुशी तो नष्ट होती ही है और भारीपन भी महसूस होता है ।अगर हमारी दृष्टि कटुता वाली है तो दुसरे भी हमारी ओर कटुता से ही देखेंगे और जब इंसान में खुद बुराई होती है तभी उसे दूसरों में भी बुराई नज़र आती है ।तो हमें सभी को आत्मिक दृष्टि से देखना चाहिए और यही संकल्प करना चाहिए कि सभी भगवान के बच्चे हैं इसलिए उनमें खूबियां भी अवश्य ही होंगी और उन्हीं की तरफ हमारा ध्यान जाए।
जब हम राजयोग के द्वारा किसी विघ्न व परिस्थिति को दूर करने का अभ्यास करते हैं तो भी मन में संपूर्ण विश्वास के साथ करें , ज़रा भी संशय न हो की विघ्न दूर होगा के नहीं आदि। भगवानुवाच- निश्चयबुद्धि विजयन्ति , संशयबुद्धि विनश्यन्ति।
कोई आत्मा अगर बुरी दृष्टि से देखने में डरे भी तो भी यह उसके निर्मल चरित्र की पहचान है क्योंकि क्रिमिनल दृष्टि से देखना एक पापकर्म है| भगवानुवाच- कामजीत बनने से तुम जगतजीत बन जायेंगे |नोट- राजयोग के मार्ग में काम वासना का दमन नहीं होता बल्कि उसे नष्ट कर दिया जाता है और इस मार्ग में एनर्जी को block नहीं अपितु सही दिशा में channelize करा जाता है | योग के अभ्यास से आत्मा में purity की फीलिंग्स इमर्ज होने लगती हैं |
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7. स्वयं में विल पॉवर भरना और अपने जीवन को दर्पण बनाना
मनुष्य में विल पॉवर की कमी का कारण उसके नेगेटिव विचार हैं ।इन्हीं नेगेटिव विचारों के कारण उसका शक्तिशाली मन निर्बल हो गया है ।अलबेलेपन और आलस्य का भी यही कारण है।शरीर में स्फूर्ति न होने का कारण है कि मन सुस्त है ।अतः विल पॉवर को मन में पुनः जागृत करने के लिए प्रतिदिन एक पावरफुल थॉट अपने पास लिखें ,जैसेकि – मुझ आत्मा ने कल्प-कल्प माया पर जीत प्राप्त करी है , मैं सर्वशक्तिवान की संतान हूँ तो मुझे इन परिस्थितियों से घबराने की क्या आवश्यकता है और उसे दिनभर स्मृति में लाते रहे।अपने मन की तार को सर्वशक्तिवान के साथ जोड़ने से विल पॉवर में वृद्धि होगी।
भगवान इस धरती पर आकर स्वयं मनुष्यों को भ्रष्टाचारी से श्रेष्ठाचारी बना रहा है। तो अपने देश और विश्व को बचाने के लिए अपने अंदर spiritual power बढाएं , पवित्रता का मार्ग अपनाएं | ऐसे कार्य करें कि हर व्यक्ति आपके जीवन से प्रेरणा ले।अपने विचारों को श्रेष्ठ बना लेंगे तो सभी का कल्याण कर सकते हैं।
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8. ब्रह्माकुमार-ब्रह्माकुमारियों के जीवन में हल्केपन का कारण इस संगमयुग में स्वयं परमात्मा अवतरित होकर राजयोग की विद्या दे रहे हैं।अब तो हर व्यक्ति को यह बात महसूस कर लेनी चाहिए कि किसी भी जगह , किसी भी समस्या में वह अकेला नहीं बल्कि स्वयं भगवान उसके साथ हैं ।परमात्मा भी अपनी हर संतान की मदद करने में बेहद तत्पर हैं इसलिए संपूर्ण ईश्वरीय ज्ञान लेकर हम उनके प्रति समर्पण भाव से हर कार्य करें ।उन्हें भी अपने परिवार का हिस्सा मान लें , यूँ कहें उन्हें अपने परिवार का मुखिया माँ लें ।उसे हमसे कुछ नहीं चाहिए , वे तो बस हमारे प्यार और भावनाओं को देखता है। हम उनकी आज्ञाओं पर चलकर , पुण्यकर्मों के द्वारा उनका दिल जीत सकते हैं ।सत्यता , रहमदिली , पवित्रता , दया को अपने जीवन में धारण कर सकते हैं ।उनके बेहद कार्य में अपनी सहयोग की उंगली दे सकते हैं । फिर वो भी हमारी समस्या को अपनी समस्या समझने लगते हैं और हमें सहज ही उनसे पार लगा देते हैं।
परमपिता ने जो हमें ड्रामा का ज्ञान दिया है , उसे प्रयोग कर हर ब्रह्माकुमार-ब्रह्माकुमारी ने अपने जीवन को बिल्कुल हल्का कर दिया है।उन सभी ने परमात्मा को अपना मान लिया है और परमात्मा ने भी उन्हें अपना मान लिया है ।उनके जीवन में हरपल ख़ुशी और सुख की अनुभूति कराने वाला है।
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विशिष्ट विभूतियों के अनुभव
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ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय संस्थान में विशिष्ट विभूतियों के अनुभव
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यहां हम आपको कुछ विशिष्ट हस्तियों के अनुभव साझा कर रहे हैं, जो हूबहू उन्हीं के शब्दों में है।ये अनुभव उन्होंने ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त करने के बाद माउण्ट आबू में परमात्मा से मिलने के बाद दिये।परमात्म-मिलन मनाने वाली और हमसे अपने अनुभवों को शेयर करने वाली हस्तियों की सूची बहुत लंबी है, जिसमें कुछ के विचार हम ज्यों का त्यों आपके सामने रख रहे हैं............
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माउण्ट आबू के पवित्र शुद्ध वातावरण में आकर अपने को बहुत भाग्यवान समझती हूँ, गुलजार दादी के तन में शिव बाबा का जब अवतरण हुआ उस मिलन से मुझे बहुत दिव्य अनुभूति हुई।
पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल
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परमात्मा शिवबाबा अभी संगमयुग पर नई सतयुगी दुनिया की स्थापना कर रहे हैं, यह मेरे जीवन का सत्य अनुभव है।मैं तो धन्य हूँ जो परमात्मा से मिलन का हर वक्त अनुभव करता हूँ।
वी ईश्वरैय्या, पूर्व मुख्य न्यायधीश, आन्ध्रप्रदेश हाइकोर्ट
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ब्रह्माकुमारीज संस्थान में सचमुच की स्थापना हो रही है, बाकी सब तो केवल बातें करते हैं, परन्तु यहां दैहिक भाव से परे अव्यक्त सत्ता परमात्मा के अवतरण की बेहद सुखद अनुभूति है।
- स्वामी चक्रपाणि, अध्यक्ष, हिन्दू महासभा
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ब्रह्माकुमारीज की सेवाएं अनमोल हैं, जिनको मैं नमन करता हूँ, यहां परमात्मा स्वयं ज्ञान दे रहे हैं, मैं भाग्यशाली हूं, जो उनकी कृपा हम पर हुई,.....हम उनके सानिध्य में आ पाये, यहां के सच्चे आध्यात्मिक आनन्द की तुलना नहीं की जा सकती, दुनिया में करोडो है, लेकिन ये सबके नसीब में नहीं होता।
- अन्ना हजारे
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यहां पर परमात्मा का अवतरण देखा, वे नई सतयुगी दुनिया की स्थापना करा रहे हैं........मेरे मन में कई सवाल थे जैसे ही मुझे शिवबाबा का ज्ञान मिला और उनसे मिला तो सारे सवालों के जवाब मिल गया, हलचल समाप्त हो गई।
पद्मश्री डॉ.भक्तवत्सलम,अध्यक्ष के.जी. हास्पिटल ग्रुप
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आबू में शिव बाबा से मिलकर मैं रोमांचित हो गया और उस खुशी को रात भर बार-बार दोहराकर अनेक दिव्य अनुभव और आनंद की अनुभूति करता रहा।
तत्कालीन राष्ट्रपति, डॉ. ए. पी.जे. अब्दुल कलाम आजाद,
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जी हाँ.! ब्रह्माकुमारीज में आकर मैं ईश्वर से बिल्कुल साक्षात में मिला हूँ, मैं बिल्कुल सामने बैठा था जब गुलजार दादी के तन में परमात्म प्रवेशता हुई।सब कुछ बदल गया और अनोखा अलौकिक सुख व परमानन्द मिला।
-रमेश गर्ग मुख्य न्यायाधीश (रि)गुवाहाटी हाईकोर्ट
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यहाँ परमात्मा का चैतन्य स्वरूप अनुभव हुआ, जिससे देवत्व मिल सकता है।ये मेरा सौभाग्य है जो मैं यहाँ पहुँच पाया, मेरा मत है कि सभी धार्मिक मठाधीशों को अब जाग जाना चाहिए और यहां से जुडकर इसका प्रसार करें।
-श्री जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी औंकारानन्द सरस्वती
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आबू सचमुच परमात्मा शिवबाबा का घर है, यहां से सभी लोगों को परमात्मा का ज्ञान लेकर अपना जीवन सुखी बनाना चाहिए, शिवबाबा यहां से एक नया समाज बना रहे हैं।मुझे यहां दिव्य अनुभूति हुई।
-शिवराज सिंह चौहान, मुख्यमंत्री(म.प्र)
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खुदा कौन है, क्या मैं उससे मिलकर उसका प्यार व शक्ति अनुभव कर सकता हूं।इन सारे सवालों का जवाब मुझे तब मिला, जब ब्रह्माकुमारीज से जुडा।खुदा खुद धरती पर आकर नई दुनिया बना रहा है।
- निजार जुमा, 51 अन्तर्राष्ट्रीय कम्पनियों के अध्यक्ष केन्या
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मेरा अहो सौभाग्य कि मुझे ब्रह्माकुमारी मुख्यालय आबू में परमपिता परमात्मा के अवतरण का सुन्दर दृश्य देखने व मिलने का अवसर मिला, अद्भुत अनुभूति हुई, ईश्वर की सौगात मिल गयी।कैसे आभार व्यक्त करूँ।
डी.आर.कार्तिकेयन, डायरेक्टर- सी.बी.आई. (रि)
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Day 7 D
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7th day class
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आज साप्ताहिक कोर्स का अंतिम दिन में आप सभी का हार्दिक स्वागत है।
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ऊपर इस पिक्चर को देखिये।यह है----
मनुष्य सृष्टि रूपी कल्प -वृक्ष
भगवान ने इस सृष्ठि रूपी वृक्ष की तुलना एक उल्टे वृक्ष से ही की है क्योंकि अन्य वृक्ष के बिज तो पृथ्वी के अन्दर बोये जाते है और वृक्ष ऊपर को उगते है लेकिन मनुष्य सृष्ठिरूपी वृक्ष के जो अविनाशी और चेतन बीज स्वरुप परमपिता परमात्मा शिव है, वह स्वयं ऊपर परमधाम अथवा ब्रह्मलोक निवास करते है।
चित्र में सबसे निचे कलियुग की अंत और सतयुग की आरम्भ का संगम दिखलाया गया है। वहा श्वेत वस्र धारी प्रजापिता ब्रह्मा ,जगदम्भा स्वरस्वती तथा कुछ ब्रह्मणिया और ब्राह्मण सहेज राज योग की स्थिति में बैठी है।
इस चित्र द्वारा यह रहष्य प्रकट किया गया है कि कलियुग की अन्त में अज्ञान रूपी रात्रि के समय ,सृष्टि के बीजरूप ,कल्यांणकारी ज्ञान/सागर परमपिता परमात्मा शिव नई , पवित्र सृष्टी रचने की संकल्प से प्रजापिता ब्रह्मा की तन में प्रवेश करके उनके द्वारा मूल गीता ज्ञान तथा सहेज राजयोग की शिक्षा दी,जिसे धारण करने वाले नर-नारी को पवित्र ब्राह्मण कहलाये। इन ब्राह्मण ब्रह्मणिया को शिव शक्तिया भी कहा जाता है। प्रजापिता ब्रह्मा के मुख से (ज्ञान द्वारा)उत्पन्न हुए।
इस छोटे से युग को संगमयुग कहा जाता है। वह युग सृष्ठि का 'धर्माऊयुग ' ,पुरुषत्तम', गीता युग भी कहा जा सकता है।
अभीतक हमें बहुत सारा ज्ञान तो मिला है लेकिन ज्ञान से तो सिर्फ काम नही चलेगा।उसे प्रयोग भी करना है योग की द्वारा। परन्तु हर काम का एक विधि होता है।अगर हम ठीक ठीक विधि पूर्वक कोई भी काम करे तो सफल जरूर होंगे।
राजयोग में लिए भी कुछ नियम अगर आप फॉलो करे तो आप जरूर सफल होंगे।
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राजयोग की स्तम्भ अथवा नियम
योग के अभ्यास के लिए उसे आचरण सम्बन्धी कुछ नियमों का अथवा दिव्य अनुशासन का पालन करना होता है, क्योंकी योग का उद्धेशय मन को शुद्ध करना, दृष्टीकोण में परिवर्तन लाना और अपना चित्त को सदा प्रसंन्न बनाना है। अगर हम निचे दिए गए विधि को अपना जीवन ।इ अपनाये तो कुछ ही दिनों में हम योग की मार्ग में जरूर सफलं होंगे। आइये जानते है वो नियम क्या है।
ब्रह्मचर्य या पवित्रता
सात्विक आहार
सत्संग
दैवी गुण
इन नियमो को पालन करने से ही मनुष्य सच्चा योगी जीवन बना सकता है तथा रोग,शोक,दुःख व अशांति रूपी भूतो के बन्धन से छुटकारा पा सकता है।
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राजयोग से प्राप्ति -अष्ट शक्तियाँ
राज योग माना परमात्मा से मन की लग्न में रहना,इससे आत्मा को सिर्फ सुख शांति हो नही अनेक आध्यात्मिक शक्तिया प्राप्ति होते है, उनमे मुख्या 8 शक्ति है...
समेटने की शक्ति(power to pack up)...
सहन शक्ति(Power to Tolarate)
सामने की शक्ति(power to accomodation)
परखने की शक्ति(Power to descriminate)
निर्णय करने की शक्ति(Power to Judge)
सामना करने का शक्ति(Power to face)
सहयोग शक्ति(Power to Co-operate)
विस्तार को संकीर्ण करने का शक्ति(Power to Withdraw)
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7days का कोर्स यहा ही समाप्त होता है। आप सभी को बहुत बहुत धन्यवाद। आप योग की रह पर चलकर अपना जीवन को सफल करे तो हमारा यह प्रयास भी सफल होगा। नमस्कार
शुभ संकल्प के ओम् शांति
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Day 6 D
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6th day class
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आज की क्लास में आप सभी को दिल से स्वागत करते है।
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आज हम पढ़ेंगे एक मनुष्य कितने जनम लेते है इस बारेमे। इस विषय पर भी बहुत मत-भेद है। कोई कहते है 84 जन्म कोई कोई कहते है 84 लाख जन्म। हम आज इस पर प्रकाश डालेंगे।इसके बाद आप खुद ही विचार कीजियेगा सच क्या और झूट क्या??? निचे दिए गया पिक्चर को देखिये।
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इसमें एक शिढ़ि दिखाई गयी है। जिसमे दिखाई गयी है ---
मानव आत्मा कितने जन्म लेती है ?किस युग में कितने होते है।
मानव आत्मा सारे कल्प में 84 जन्म लेते है। मानव आत्मा ज्यदा से ज्यदा 84 जन्म ,काम से काम 1 जन्म लेती है। 84 जन्म की चक्र सीढ़िया के रूप में चित्रित किया गया है।
सीढ़ी की ऊपर देखे।इसमें सतयुग दिखाया गया है। इस युग में 8 हैं लेती है।इस युग की आयु 1250 वर्ष है। इस युग में लक्ष्मी नारायण की पालना होती है। राधे कृष्णा की around 30वर्ष पूरा होनेबाद स्वयंभर के पश्चात् लक्ष्मी नारायण बन राज्य् करेंगे।
लक्ष्मी नारायण 100% सुख शांति सम्पन्न 8 जन्म लेते है। इसलिए भारत में 8 की संख्या शुभ मानी गई है। और कोई लोग केवल 8 मणको की माला सिमरण तथा अष्ठ देवताओं का पूजा भी करते है। इस समय को सूर्य वंस भी कहा जाता हैं। यह हर एक 150 वर्ष पूरी तरह से जीने के बाद पुराण शरीर छोड़ नया शारीर धारण करते है।
9 लाख जनसंख्या से सुरु हुए सतयुग अंत तक पबुचते 2 कोरोड़ आबादी होते है।
फिर त्रेता के1250 वर्ष में 14 कला सम्पन्न राम-सीता के वंस पुज्ज्य राजा -रानी अथवा उच्च प्रजा के रूप में 12 जन्म लेते है। इस युग के अन्त में 33 कोड़ोड़ आवादी होते है।इस युग को चंद्रवंशी कहा जाता है। इन दोनों युगों में न्यायालय नही होते विकार वहा संग संध विद्रोह काम नही करते ।इसलिए इन दो युगों को मिलाकर स्वर्ग व राम राज्य् कहलाता है।इस प्रकार सतयुग और त्रेतायुग में कुल 2500 वर्षो में सम्पूर्ण पवित्रता सुख शांति और स्वस्थ सपन्न 21 दैवी जन्म लेते है। इस 21 दैवी जन्म में कुल मिलकर 33 कोरोड़ जनसंख्या होता है।इसलिए भारत में आज भी गायन है। भारत 33 कोरोड़ देवी देवताओं का देश है।
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द्वापर और कलियुग में कुल मिलकर 63 जन्म होता है।
धीरे धीरे पुनर जन्म लेते लेते कलाएं भी कम होते जाते है। और सुख भी कम होते जाते है। और देह अभिमान में आना सुरु होता है। द्वापर माना 1/2 soul consciousness 1/2 body consciousness. Body consciousness में आने के नाते इस समय मनुष्य में थोडा थोडा दुःख सुरु हो जाता है।और वो सुखो के लिए पूजा पाठ आदि सुरू कर देते है। इस समय मनुष्य 21 जन्म लेते है।
चित्र में द्वखिये--सीढ़ी और भी उतारते जाते है ।कलाएं और भी कम होता जाता है। दुःख अशांन्ति भी बढ़्ते जाते है। सुख शांति के लिए इंसान भटकते रहते है।। इसलिए द्वापर में जो देवता थे वो ही पुज्ज्य और कलियुग आते आते खुद ही पुजारी बन गयी।
द्वापर युग से कुछ आत्माएं जैसे की बुद्ध, गुरु नानक ,क्रिस्ट आदि धरती पर आते है।अपने धर्म स्थापन करके धर्म बोध करते मानव में परिवर्तन लेन के लिए प्रयास करना आरम्भ करते है।
द्वापर के अंत तक आत्मा में 8 कला और कलियुग की अंत तथा अभी का समय आत्मा की कला सुण्य है। इस समय मनुष्य ज्यादा से ज्यादा 42 जन्म लेती है। और 2500 वर्ष ऐसे पूरा होता है। कुल मिलकर इस चक्र 5000 वर्ष का पूरा होता है इस युग के अंत तक परमधाम में रहने वाली सब आत्माये आकर परमधाम खाली होता है। अधर्म हद पार करते दुःख,अशांति,अकाल मृत्त्यु,प्राकृतिक आपदाओं,साइन्स की दुर्घटनाये धीरे धीरे बढ़कर त्राहि त्राहि मचाते है। पिछले जन्मों में किये हुए पाप की खातों को पूरा करने का समय यही है। क्यों की परमपिता परमात्मा धरती पर अवतरित हो चूका है।सब पतितों को पावन बनाकर आपने घर ले जाने के लिए । एक नया सृष्ठि तथा फिर से इस धरा पर सतयुग लेन के लिए
इसलिए भारत में जन्म-मरण के चक्रों को ''चौरासी का चक्कर '' भी कहते है और देवियों का मंदिरों में 84 घंटे भो लगे होते है तथा उन्हें ''84 घंटे वाली देवी'' नाम से लोग याद करते है।
यह तो गया 84 जन्म का तथा 5000 साल का अद्भुत कहानी। जो की परमपिता परमात्मा धरती पर आकर खुद बताया है।
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अब हम प्रकाश डालते है और एक वितार्कित विषय पर
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मनुष्यात्मा 84 लाख योनिया धारण नहीं करती
परमपिता परमात्मा शिव ने वर्तमान समय जैसे हमें इस्वरियों ज्ञान के अन्य अनेक मधुर रहष्य समझाया है वैसे ही यह भी एक नयी बात समझाई की वास्तव में मनुशात्माएँ कोई भी पाशविक योनिया में जन्म नही लेती।यह हमारे लिए बहुत ही ख़ुशी की बात है।
परन्तु फिर भी कोई लोग ऐसा है जो कहते है की मनुष्यात्माएँ पशु-पक्षी इत्तादि 84 लाख योनियों में जन्म-पुनर्जन्म लेती है। उनकी पापों के अनुसार।
हम एक बात आपसे पूछते है वास्तब में कौन ज्यदा भोगते है । मनुष्य या पश-पक्षी? आज मनुष्य में कितना सरे बीमार दिखाय जा रहा है। और पशु -पक्षियों में ? आप खुद ही सोचिये यह सच या झूट। पाप कर्म इंसान से ही ज्यदा होता है।पशु-पक्षीयो में नहीं। तो फेर पापों का फल स्वरुप पशु-पक्षियों का जन्म होता है यह सच है? आपको क्या लगता है ?
यदि मनुष्य आत्माये पशु योनि में पुनर्जन्म लेती तो मनुष्य गणना बाढ़ती न जाती।आप स्वयं ही सोचिये की यदि बुरे कर्मो के कारण मनुष्यात्मा का पुनर्जन्म पशु योनि में होता, तब तो हर वर्ष मनुष्य गणना बढ़ती न जाती,बल्कि घटती जाती क्योंकि आज सभी के कर्म ,विकारों के कारण विकर्म बन रहे है। परंतु आप देखते है की फिर भी मनुष्य गणना बढ़ती हो जाती है,क्योंकि मनुष्य पशु-पक्षी या किट पतंग आदि योनिया में पुनर्जन्म नहीं ले रहे है। आपका क्या कहना ?
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Day 5 D
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5th day class
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आज की क्लास में आप सभी को दिल से अभिनन्दन ,स्वागत है आपका अभी तक classes में हमने काफी कुछ जाना है...
मैं कौन हु?
सर्व आत्माओ के पिता परमपिता परआत्मा का भी परिचय मिला हमें । बस अभी उसके साथ एक प्यारसा रिश्ता जोड़ना है हमें।नही तो सिर्फ जानने से कोई फायदा नही।
शिव और शंकर में अंतर।
शिव रात्रि का रहष्य अदि..
आइये आज हम और एक स्टेप आगे बढ़ते है।
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आज जो टॉपिक के बारे मे हम प्रकाश डालने जा रहे है इसको लेके बहुत मतभेद है।बहुत interesting भी है।
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सृष्ठि चक्र
WORLD DRAMA WHEEL (Wonderful secret)
शिव भगवानुवाच.....आप यहां पहेली बार ही नहीं आए, आप 5000 वर्ष पूर्व भि इसी स्थान पर, इसी समय पर इसी प्रकार ज़े आए थे,अब आए है और हर 5000 वर्ष पश्चात् आते रहेंगे क्योंकि इस सृष्ठि रूपी नाटक की हर 5000 वर्ष पश्चात् हूबहू पुनरावृत्ति होती है।
है ना रहष्य की बात। अब इसको थोडा विश्लेषण करते है।
सृष्ठि रूपी नाटक के चार पद ऊपर चित्र दिखाया गया है की स्वस्तिक सरिःथि चक्र की चार बराबर भागो में बाँटता है--
सतयुग,
त्रेता युग
द्रापर युग
कलियुग
सृष्ठि नाटक में हर एक आत्मा एक निश्चित समय पर परमधाम से इस सृष्ठि रूपी नाटक के मंच पर आती है।सबसे पहले सतयुग और त्रेता युग के सुन्दर दृश्य सामने आते है और इन दो युग की सुखपूर्ण सृष्ठि में पृथ्वी मंच पर एक अदि सनातन देवी-देवता धर्म -वंश की ही मनुष्य आत्माओं का पार्ट होता है। अन्य सभी धर्मात्माएँ परमधाम में होती है।
सृष्ठि नाटक में हर एक आत्मा एक निश्चित समय पर परमधाम से इस सृष्ठि रूपी नाटक के मंच पर आती है।
सबसे पहले सतयुग और त्रेता युग के सुन्दर दृश्य सामने आते है और इन दो युग की सुखपूर्ण सृष्ठि में पृथ्वी मंच पर एक अदि सनातन देवी-देवता धर्म -वंश की ही मनुष्य आत्माओं का पार्ट होता है। अन्य सभी धर्मात्माएँ परमधाम में होती है।
द्वापर युग में यह धर्म ही रजोगुण अवस्था में इब्राहिम से इसलाम धर्म ,बुद्ध से बौद्ध धर्म , क्राईस्ट से क्रिस्टियान धर्म , स्थापन होती है। यह चार मुख्या धर्मपिताएं ही दुनिया के ड्रामा के मुख्या एक्ट्रेस। इनके धर्म ग्रन्थ ही मुख्या शास्रों है। इनके अतिरिक्त , संन्यास धर्म के स्थापक शंकराचर्य ,मुसलमान (मुहमदी) धर्म -वंश के स्थापक मुहम्मद तथा सिख धर्म के संस्थापक नानक भी इस विस्व नाटक के मुख्या अक्टिरों में से है।
इन अनेक मत मतान्तर के कारण द्वापर युग तथा कलियुग की सृष्ठि में दैत , लड़ाई -झगरा तथा दुःख होता है।
कलियुग के अंत में धर्म पूरी तरह नष्ट हो जाता है।
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श्रीमद् भगवत गीता में भी कहा गया है....
यदा यदा ही धर्मश्य ग्लानिभर्वति भारत परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मं स्थापनायर्थ सम्भायामी युगे युगे।
अभी बिलकुल वह ही समय है हर तरफ अति हो चूका हा। इसलिए इस सृष्ठि नाटक की करता और डायरेक्टर शिव परमात्मा प्रजापिता ब्रह्मा की शारीर में स्वयं अवतरित होते है। इस कल को संगम युग कहते है कलियुग के अंत और सतोयुग की आरम्भ के बिच में यह संगम युग बहुत ही महत्यपूर्ण है। क्योंकी सिर्फ इस समय ही हम परमात्मा के साथ मिलान माना सकते है।
इस प्रकार से अनादि से निश्चित जो यह सृष्ठि नाटक 5000 वर्षो में एक बार जो है वैसे ही पुनरावृत्ति होती ही रहती है। 4 युगों को मिलकर कल्प कहा जाता है।कल्प में एक बार सृष्ठि चक्र जैसा है वैसा चलता ही रहता है। इसलिए कुछ भी होजाए वह नया कुछ भी नहीं,कल्प में जो हुआ अब हो रहा है ,अब जो हुआ फिर कल्प में होगा। यह सृष्ठि नाटक का ज्ञान बुद्धि में रखने वाले कुछ भी हो वह ड्रामा में है इसलिए हुआ तो स्थिर रहेंगे।
नारायण के हाथ में सुदर्शन चक्र इस सृष्ठि चक्र घूमने का ही प्रतिक मात्र है।
कलियुग के विनाश के बाद इस धरती पर सतयुग आनेवाला है।इस सतयुग में पहेला राजकुमार श्री कृष्णा का राज्य् आने वाला है।
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भक्ति में कृष्णा पानी के बिच में पीपल की पत्ते पर तैरते दिखए ....उसका अर्थ क्या है??
शिव परमात्मा बता रहे है---विनाश के बाद दुनिया में जो 3 भाग धरती जलमई होता है ,विदेश के निशानी भी नही होंगे, सिर्फ भारत देश हो बच जायेगा, कृष्णा का राज्य् सुरु होता है इसलिए भारत देश को पीपल के पत्ते,जलमई को पानी में दिखाया है। भविष्य में आनेवाले स्वर्ग किस तरह है वह सुन्दर दृश्य को निचे पिक्चर में दिखाया गया है।
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Day 4 D
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4rt day class
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ओम शांति आज की क्लास में हार्दिक स्वागत है आपका
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पिछले 3 क्लास में हमने काफी कुछ जाना है हम एक आत्मा है, परम पिता परमात्मा हमारा पिता है उसका निवास स्थान , कर्त्तव्य इस बारेमे भी हमने जाना। आज और एक नया बाते आपके सामने रखेंगे। भक्ति मार्ग में ज्यदा तक लोगों को लगता है शिव और शंकर एक ही है। यह एक महान भूल है।
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शिव भगवान है-शंकर सूक्ष्म देवता है।
शंकर शिव के स्मृति में निमग्नहोते हुए शंकर के सामने शिव लिंग दिखाया गया है।
शिव परमधाम वासी -शंकर सूक्ष्मवतन वासी।
शिव कलयाणकारी -शंकर विनाशकारी।
शिव ज्योतिर्बिंदु-शंकर तपस्यीमूर्ति है।
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शंकर के रूप का अर्थ-
शंकर के सिर पर रहने वाली चन्द्रमा शीतलता के दैवी गुण की चिन्ह है।
कंठ में साँप माना विकारो रूपी सर्पों को गले का हर बनाने का चिन्ह है।
सिर पर गंगा का अर्थ बुद्धि में ज्ञान गंगा प्रबाह करने की चिन्ह है।
वैराग्य के प्रतिक कब्रिस्थान में विहारते रहते है।
बाघ की खाल शक्तिशाली स्थिति का चिन्ह है।
ज्ञान रूपी त्रिनेत्र की स्मृति चिन्ह तीसरा नेत्र कहा जाता है।
आशा करते है अब आपको और कभी भी यह भ्रम नही होगा की शिव और शंकर एक ही है
अब हम और थोडा आगे चलते है
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शिव का जन्मोत्सव रात्रि में क्यों ?
एक शिव का जन्मतसब रात्रि में मनाया जाता है क्यों की---रात्रि वास्तब में अज्ञान ,तमोगुणी अथवा पापाचार की निशानी है। द्रापरयुग से कलियुग के समय को रात्रि कहा जाता है। कलियुग के अन्त में जबकी साधू सन्यासी ,गुरु ,आचार्या इत्तादि सभो मनुष्य पतित तथा दुखी होते है और अज्ञान निद्रा में सोये पड़े होते है ,जब धर्म की ग्लानि होती है और जब यह भारत विषय विकारी के कारण वेश्यालय बन जाता है,तब पतित पावन परमपिता परमात्मा शिव इस सृष्ठि में दिव्या जनम लेते है। इसलिये अन्य सबका जन्मोत्सव जन्म दिन के रूप में मनाया जाता है परंतु परमात्मा शिव के जन्म दिन को शिव रात्रि ही कहा जाता है।
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Day 3 D
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3rd day class
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ओम् शान्ति आज की क्लास में हार्दिक स्वागत है आपका
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जैसे की कल मैंने कहा था परमात्मा का निवास स्थान के बारेमे थोडा सा विश्लेषण करेंगे।अगर हमें यह क्लियर न हो परमात्मा और आत्मा का असली घर कहा है तब तो उससे यद् करना भी मुश्किल ही जायेगा
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परमात्मा परमधाम निवासी है
ऊपर पिक्चर को ध्यान से देखिये यह तिन धाम तथा तिन धाम दिखाया गया है...
सबसे निचे है..
साकार लोक
भूमि , सुर्य ,तारागण समूह को साकार लोक कहलाते है। इस लोक पाँच तत्वो से निर्मित किया गया है। इसे मनुष्य लोक, कर्मक्षेत्र भी कहते है।
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सुक्ष्म लोक
इस मनुष्य -लोक के सूर्य तथा तारागण के पर तथा आकाश तत्व के भी पर एक सूक्ष्म लोक है जहां प्रकाश ही प्रकाश है। यह संगम युग में शिव भगवान के दिव्य शक्ति के द्वारा प्रकाश के प्रदेश का निर्माण किया गया है।यहा अव्यक्त ब्रह्मा की आत्मा सूक्ष्म शारीर में रहते है।
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परमधाम
सूक्ष्म वतन से ऊपर साइंस के साधन भी जहाँ दूर दूर तक पहुँच नहीं सकते उतना दूर है। इसमें सुनहरे -लाल रंग का प्रकाश फैला हुआ है जिसे ही ब्रह्मा तत्व,छठा तत्व,अथवा महातत्व कहा जा सकता है।इसे निर्वाण धाम,परलोक,मुक्तिधाम,शान्तिधाम, शिवलोक इत्तादि नमो से याद् किया जाता है।
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आज और एक चैप्टर पर छोटासा प्रकाश डालते है...वह है....
परमपिता परमात्मा और उनकी दिव्य कर्त्तत्व
परमात्मा शिव ज्योतिर्बिंदु स्वरुप है इसलिए बे बह्रह्मा, विष्णु,शंकर तीनो सूक्ष्म देवताओं के माध्यम से स्थापना ,पलना,विनाश इन तिन दिव्य कर्त्तव्य को कराते है। इसलिए शिवलिंग के ऊपर तिन लकीरों के बिच छोटा बिंदु लगते है।
शिव परमात्मा 1936 दादा लेखराज के नाम के एक बूढ़े शारीर में प्रवेश करके इस ज्ञान का प्रबोध किया। उनको ही प्रजापिता बह्रह्मा के चित्र में दिखाया गया। वास्तब में ब्रह्मा माना तिन सिरधारी कमल असनधरि होक,हाथों में वेद शास्रों ,उन बूढ़े मानव रूप में दिखाया गया। इसका अर्थ यह है की इस समय इस वृद्ध मानव द्वारा परमात्मा शिव तिन लोक ,तिन कल के ज्ञान को ,वेद शास्र के सार को बतलाया।
इस विधि से ब्रह्मा द्वारा स्थापना
आने वाले स्वर्ग में विष्णु की पलना होती है। ब्रह्मा माना कोई आध्यात्मिक रहष्य जैसे ऊपर बतलाया गया
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वैसे विष्णु माना लक्ष्मी नारायण के संयुक्त रूप है।
आनेवाले स्व्वर्ग में लक्ष्मी नारायण कि पालना होती है इसलिए विष्णु द्वारा पलना कहा जाता है।
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कहा जाता है शंकर ने जब तीसरी आँख खोली दुनिया विनाश होती है।
स्वर्ग आना है तो इस नरक को विनाश होना है, इसलिए भारत देश में प्राकृतिक आपदाएं ,गृह युद्ध द्वारा और विदेशों में प्राकृतिक युद्ध द्वारा विनाश होता है। इस विधि से इन तीनों द्वारा तिन कर्त्यव्य कराने वाले निराकार शिव परमात्मा है तो इसलिए उनको त्रिमूर्ति कहा जाता है
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Day 2 D
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2nd day class
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आज दूसरा अध्याय में आपको हार्दिक स्वागत है।
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आशा करते है आपको अपना असली परिचय मिल गया।आप एक आत्मा हो।आपका original quality है आप....
ज्ञान स्वरुप हो
पवित्र स्वरुप हो
प्यार स्वरुप हो
शांत स्वरुप हो
सुख स्वरुप हो
आनन्द स्वरुप हो
शक्ति स्वरुप हो।
ज़रा सोचिये कितना शक्ति का आधार है हम आत्मा के अन्दर।और हम यह सब के लिए बाहरी दुनिया में धुनते रहते है। क्योंकि हम आत्मा पुनर्जन्म लेते लेते शक्ति का भंडार खाली हो चुके है। अभी समय है फिर से वह खोया हुआ शक्ति को भरना ।लेकिन वो शक्ति मिलेगा कहा से?? क्यों ? है ना हम सब की पिता सर्वो शक्तिमान परमात्मा। जो सर्वो शक्ति का भण्डार है। उसका असली परिचय न जानने का कारण हम उसे ठीक से याद भी नही कर पाते।
किसी का परिचय जानने के लिए 5 बाते जानना बहुत जरुरी है।वह है उसका.....
1. नाम
2.स्वरुप
3.गुण
4.निवासस्थान और
5.कर्तव्य
इस 5 बाते क्लियर होना माना उसका परिचय सम्पूर्ण हो हुआ।
कहते है न खुद को जानो गे तो खुदा को भी जान जाओगे। खुदको तो हमने जान लिया हम शरीर नहीं हम एक आत्मा है। चलो हम अभी जानते है परमात्मा के बारेमे
परमात्मा का नाम
परमात्मा को लोग कोई नामो से पुकारते है।
हिन्दू लीग कहते है 'जोतिर्लिंगम', मुस्लिम लोग कहते है' नूर, यह-अल्लाह, क्रिस्चियन कहते है यहोवा जिसका मतलब है point of light. हम उसे प्यारसे शिव बाबा कहते है
परमात्मा का स्वरुप
आत्मा का स्वरुप ज्योति स्वरुप है तो उसका पिता भी ज्योति स्वरूप ही होगा ना? इसलिए मृत्यु के बाद कुछ दिनों तक घर में ज्योति जलाया जाता है ताकि उस आत्मा को परमात्मा का रौशनी मिले। प्राय:सभी धर्मो के लोग परमात्मा को निराकार अर्थात अशरीरी मानते हैं। शिवलिंग ज्योति-बिन्दु परमात्मा की ही यादगार भारत के कोने-कोने में तथा भिन्न-भिन्न देशों में पाई जाती है।
परमात्मा का गुण
परमात्मा का नाम गुणवाचक है।चारो दिशा में पूजा होता है।जैसे अमरनाथ,विश्वनाथ,सोमनाथ,पशुपतिनाथ, रामेश्वराम आदि आदि।इस सभी नमो में उनका गुण समाया हुवा है। परमात्मा सर्वो की सद्गति दाता, शांति दाता,दिव्यबुद्धि विदाता। शान्ति के सागर,आनन्द के सागर, दया सागर ,ज्ञान सागर है।
परमात्मा का कर्तव्य
इस कलियुगी तथा पतित को पावन बनाकर सतोयुग रचना सिर्फ परमात्मा ही कर सकता है। शिव परमात्मा के तिन दिव्या कर्त्यव्य के बारेमे हम बादमे थोडा विश्लेषण करेंगे।
परमात्मा का निवास स्थान
उनका निवास स्थान है परमधाम
अब सर्वो आत्माओ का पिता एक है यह कैसे साबित करे?
प्राय लोग यह नारा लगाते है की "हिन्दू,मुसलिम,सिख,ईसाई सभी आपस में भाई-भाई है", परंतु वे सभी आपस में भाई भाई कैसे है और यदि वे भाई -भाई है तो उन सभी का एक पिता कौन है--इसे वे नहीं जानते। देह की दृष्टी से तो वे सभी भाई-भाई हो नहीं सकते क्योंकि उनके माता -पिता अलग -अलग है; आत्मिक दृष्टि से ही वे सभी एक परमपिता परमात्मा का संतान होने के नाते से भाई-भाई है। यहा सभी आत्माओ के एक परमपिता का परिचय दिया गया है।
इस पिक्चर को देखे..
अनेक मत रहते ,कोई भाषाए होते हुए सबकी भावना एक है की, भगवान एक है। रामेष्वरम् में राम शिव की पूजा करते दिखाई है माना राम देवता,शिव परमात्मा,
मक्का में मुसलिम लोग लिंग के आकर को संग-ए-असवद की प्रतिमा के रूप में आराधना करते है।
क्राईस्ट लोग भगवान प्रकाश के चमक कहके मोमबत्ती जलाते है।
इसका मतलब सर्व धर्म आत्माएं भगवान निराकार है,इस विषय को मान रहे है।
राम, कृष्णा पुज्ज्य देवता है। क्राईष्ठ ,इब्राहिम गुरुनानक आदि धर्मपिता थे, इन सबको परमपिता शिव परमात्मा ज्योतिर्बिंदु स्वरुप है।
देवतायें अनेक होते है परन्तु सबके पिता भगवान एक ही है।
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Introduction D
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7 DAY REWISE COURSE में आप सभी को दिल से अभिनन्दन
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परिचय पर्व
प्रजापिता ब्रह्मकुमारिज ईश्वरीय विश्वविद्यालय
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यह ज्ञान जो हम आप लोगों को सुनाने जा रहें है यह मुझे " प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय " से मिली है, जिसका मुख्यालय आबू पर्वत, राजस्थान, भारत में है। इस विश्वविद्यालय स्वयं भगवान ने स्थापित किया है और स्वयं भगवान ही यहाँ पढ़ाते है। विश्व के कोने-कोने से लोग इधर आकर श्रेष्ठ ईश्वरीय वा आध्यात्मिक ज्ञान का आनन्द लेते है।विश्व के 138 देशों में इसके शाखायें है। यहाँ आत्मा और परमात्मा का सत्य पहचान, सृष्टि चक्र, कर्मो की गुहय गति, राजयोग अर्थात परमात्मा से कनेक्शन जोड़ने की विधि आदि गहरे विषयों का स्पष्टीकरण किया जाता है।अपने जीवन को श्रेष्ठ बनाने की यह लाइट हाउस है।
ज्ञान एवं सहेज राजयोग के द्वारा सतयुग की स्थापनार्थ ज्योति-बिंदु शिव का जिस तन में 'दिव्य प्रवेश ' हुआ उस मनुष्य को उन्होंने 'प्रजापिता ब्रह्मा' --यह अलौकिक नाम दिया। उनकेऊख द्वारा जन्म ज्ञान एवं योग की शिक्षा लेकर ब्रह्मचर्य व्रत धारण करने वाले नर और नारियों को ब्रह्माकुमार और ब्रह्माकुमारी कहा जाता है।
आईये हम आगे बढ़ते है। पहचाने खुदको ....हम कौन है?
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Day 1 D
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1st day class
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आप आत्मा है
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इस पिक्चर को देखिये। एक गाड़ी है उसके अंदर एक ड्राईवर भी है।अब ड्राईवर गाड़ी में बैठके नही कहेंगे की में ही गाड़ी हु। हमारा शरीर भी इस गाड़ी की तरह ही है। आत्मा इसका ड्राईवर। जैसे ड्राईवर गाड़ी का नियंत्रण करता है उसी प्रकार आत्मा भी शरीर का नियंत्रण करता है। आत्मा के बिना शारीर निष्प्राण है,जैसे ड्राईवर के बिना गाड़ी।
वास्तव में मैं शब्द शरीर से भिन्न चैतन्य शक्ति आत्मा का ही सूचक है । आत्मा और शरीर को मिलकर बनता है जीवात्मा।
शरीर में आत्मा का स्थान
आत्मा का स्थान शारीर का control room अर्थात मस्तिस्क में,(hypothalamus and pituitary केबिच में तथा भृकुटि की बिच में रहते है) इसे 3rd eye ,aggya chakra भी कहते है। यह ज्योतिबिंदु स्वरुप चैतन्य शक्ति है। आत्मा शारीर के अंग के माध्यम से हर कार्यों करती है।
शरीर से आत्मा निकालने के बाद इसलिए इससे Dade body घोषित किया जाता है।क्यों की कुछ भी कर ले वो शारीर और चलने वाले नही है।इससे साबित होता है यह शारीर एक जड़ बस्तु मात्र है। *dead body
आत्मा=मन+बुद्धि+संस्कार
आत्मा में 3 सूक्ष्म शक्तिया रहती है
मन, बुद्धि, संस्कार।
मन माना आत्मा की सोचने की शक्ति,
बुद्धि माना निर्णय करने की शक्ति।
संस्कार माना कर्मेंद्रयों के द्वारा कोई काम कर रहे हो वो संस्कार के रूप में रिकॉर्ड होता है।
उदाहरण स्वरुप--
एक काम करने का सोचा वह मन में आलोचना करते हो ,वह आलोचना आत्मा में रहनाहै वाला दूसरा शक्ति बुद्धि को संकल्प रूप में मन भेजता है।यह दोनों शक्तिया सूक्ष्म इसलिए शरीर में बैधिक्क दिमाग को संकेत भेजती है। दिमाग के आदेश अनुसार कर्मेन्द्रिया काम करते है। यह अबलोकन करने की विषय यह है , की आत्मा जब शारीर छोड़ता है तब तक शारीर में जो अच्छे बुरे कर्मों के परिणाम पाप पुण्य के रूप में संस्कार लेके जाता है । लसलिए कहा जाता है सोच समझकर कर्म करे।
हर एक आत्मा का 7 गुण
1] ज्ञान स्वरुप
2] पवित्र स्वरुप
3] प्यार स्वरुप
4] शांत स्वरुप
5] सुख स्वरुप
6] आनन्द स्वरुप
7] शक्ति स्वरुप।
लेकिन पुनर्जन्म लेते लेते आत्मा का शक्ति आज डिप्लीट हो चुके है।
सच्चे सुख व सच्ची शांति के लिए स्वयं को जानना अति आवश्यक है। आत्मा को पेहचान के ही आधार से हम परमात्मा को पेहेचान सकते है।
ॐ शांति
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Revision Course 7 R
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पूरे 7 दिन का संक्षिप्त कोर्स: एक रिवीज़न
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यहाँ पूरे कोर्स का सार बिन्दुवार प्रस्तुत है :-
आत्मा अत्यंत सूक्ष्म,एक ज्योति-कण के समान है।जैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिन्दु-सा दिखाई देता है, वैसे ही दिव्य-दृष्टि द्वारा आत्मा भी एक तारे की तरह ही दिखाई देती है।
आत्मा शरीर में भृकुटि में रहती है।इसलिए भृकुटी में टीका लगाने, माताओं में बिन्दी लगाने की प्रथा है।जब मनुष्य अपने को भला- बुरा कहता है तो वह भृकुटी पर हाथ रखता है।
शरीर मोटर के समान है तथा आत्मा इसका ड्राईवर है, अर्थात जैसे ड्राईवर मोटर का नियंत्रण करता है, उसी प्रकार आत्मा शरीर का नियंत्रण करती है।आत्मा के बिना शरीर निष्प्राण है, जैसे ड्राईवर के बिना मोटर।
परमधाम में ही सबसे ऊपर सदा मुक्त, चैतन्य ज्योति बिन्दु रूप परमात्मा ‘सदाशिव’ का निवास स्थान है।इस लोक में आत्माएं कल्प के अन्त में, सृष्टि का महाविनाश होने के बाद अपने-अपने कर्मो का फल भोगकर तथा पवित्र होकर ही जाती है।
परमपिता परमात्मा का नाम ‘शिव’ है | ‘शिव’ का अर्थ ‘कल्याणकारी’ है।परमपिता परमात्मा शिव ही ज्ञान के सागर, शान्ति के सागर, आनन्द का सागर और प्रेम के सागर है।
परमपिता परमात्मा का दिव्य-रूप एक ‘ज्योति बिन्दु’ के समान है। उस दिव्य ज्योतिर्मय रूप को दिव्य-चक्षु द्वारा ही देखा जा सकता है और दिव्य-बुद्धि द्वारा ही अनुभव किया जा सकता है।
अतः जिस परमात्मा को पाने के लिए आपने इतनी भक्ति की, जप- तीर्थ,व्रत- उपवास किए।अब जबकि वह परमात्मा आ चुका है, आप भी उससे मिल सकते हैं और जीवन को सुख-शान्ति से भर सकते हैं।
हर एक धर्म के अनुयायी निराकार, ज्योति-स्वरूप परमात्मा शिव की प्रतिमा (शिवलिंग) को किसी-न-किसी प्रकार से मान्यता देते है।भारतवर्ष में तो स्थान-स्थान पर परमपिता परमात्मा शिव के मंदिर है।
जब सारी सृष्टि विकारों के पंजे में फंस जाती है तब परमपिता परमात्मा शिव सहज ज्ञान और राजयोग की शिक्षा देते है तथा सभी आत्माओं को परमधाम में ले जाते है तथा मुक्ति एवं जीवनमुक्ति का वरदान देते है।
परमात्मा सर्व व्यापक नहीं है!अपने परम प्यारे, परम पावन, परमपिता के बारे में यह कहना कि वह हर जीव में कुत्ते , बिल्ले , ठिक्कर, भित्तर सभी में है – यह कितनी बड़ी भूल है।
परमात्मा चैतन्य है, वह तो हमारे परमपिता है, पिता तो कभी सर्वव्यापी नहीं होता।अत: परमपिता परमात्मा को सर्वव्यापी मानने से ही सभी नर-नारी योग-भ्रष्ट और पतित हो गये है और उस परमपिता की पवित्रता-सुख-शान्ति रूपी विरासत से वंचित हो दुखी तथा अशान्त है।
वर्तमान समय यह संगम युग ही चल रहा है।अब यह कलियुगी सृष्टि नरक अर्थात दुःख धाम है अब निकट भविष्य में सतयुग आने वाला है जबकि यही सृष्टि सुखधाम होगी।अत: अब हमे पवित्र एवं योगी बनना चाहिए
मनुष्यात्मा सारे कल्प में अधिक से अधिक कुल 84 जन्म लेती है, वह 84 लाख योनियों में पुनर्जन्म नहीं लेती। मनुष्यात्माओं के 84 जन्मों के चक्र को ही यहाँ 84 सीढ़ियों के रूप में चित्रित किया गया है।
इस प्रकार देवता-वंश की आत्माएं 5000 वर्ष में अधिक से अधिक 84 जन्म लेती है। इसलिए भारत में जन्म-मरण के चक्र को “चौरासी का चक्कर” भी कहते है और कई देवियों के मंदिरों में 84 घंटे भी लगे होते हैं।
मनुष्यात्माएं पाशविक योनियों में जन्म नहीं लेती।यह हमारे लिए बहुत ही खुशी की बात है।परन्तु फिर भी कई लोग ऐसे है जो यह कहते कि मनुष्य आत्माएं पशु-पक्षी इत्यादि 84 लाख योनियों में जन्म-पुनर्जन्म लेती है।
परमात्मा शिव ने समझाया है की रावण कोई दस शीश वाला राक्षस ( मनुष्य) नही था, बल्कि रावण का पुतला वास्तव में बुराई का प्रतीक है। रावण के दस सिर पुरुष और स्त्री के पांच-पांच विकारो को प्रकट करते है I
इस विश्व में द्वापरयुग और कलियुग में अर्थात २५०० वर्षो में "रावण राज्य" होता है। क्योंकि इन दो युगों में लोग माया या विकारो के वशीभूत होते है उस समय रोग शोक, अशांति और दुःख का सर्वत्र बोलबाला होता हैI
अब परमात्मा शिव गीता में दिए अपने वचन के अनुसार सहज ज्ञान और राजयोग की शिक्षा दे रहे है और मनुष्यात्माओ के मनोविकारो को ख़त्म करके उनमे देवी गुण धारण करा रहे है।वे विश्व में बापू-गाँधी के स्वप्नों के राम राज्य की स्थापना करा रहे है I
वर्तमान जन्म सभी का अंतिम जन्म है I इसलिये अब यह पुरुषार्थ न किया तो फिर यह कभी न हो सकेगा।क्योंकि परमात्मा द्वारा दिया गया यह मूल गीता - ज्ञान कल्प में एक ही बार संगम युग में ही प्राप्त हो सकता हैI
अब निकट भविष्य में श्रीकृष्ण ( श्रीनारायण) का राज्य आने ही वाला है तथा इससे इस कलियुगी विकारी सृष्टि का महाविनाश एटम बमों, प्राकृतिक आपदाओ तथा गृह युद्ध से हो जायेगा I
परम शिक्षक, परम सतगुरु परमात्मा शिव कहते है, "हे वत्सो ! तुम सभी जन्म-जन्मान्तर से मुझे पुकारते आये हो कि - हे प्रभो, हमें दुःख और अशांति से छुडाओ और हमें मुक्तिधाम तथा स्वर्ग में ले चलो I अत: अब मैं तुम्हे वापस मुक्तिधाम में ले चलने के लिए तथा इस सृष्टि को स्वर्ग बनाने आया हूँI वत्सो, अब आप वैकुण्ठ चलने की तैयारी करो।
गीता-ज्ञान द्वापर युग में नही दिया गया बल्कि संगम युग में दिया गया I वास्तव में गीता-ज्ञान परमात्मा शिव ने दिया था और फिर गीता ज्ञान से सतयुग में श्रीकृष्ण का जन्म हुआI
परमात्मा शिव ने इस सृष्टि रूपी कर्मक्षेत्र या कुरुक्षेत्र पर, प्रजापिता बह्मा (अर्जुन) के शरीर रूपी रथ में सवार होकर विकारो से ही युद्ध करने कि शिक्षा दी थी ,परन्तु लेखक ने बाद में अलंकारिक भाषा में इसका वर्णन किया तथा चित्रकारों ने बाद में शरीर को रथ के रूप में अंकित किया। बाद में वास्तविक अर्थ प्रायः विलुप्त हो गया I
परमात्मा को याद करते समय हमे अपनी बुद्धि सब तरफ से हटाकर एक जोतिर्बिंदु परमात्मा शिव से जुटानी चाहिए। मन चंचल होने के कारण काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार अथवा शास्त्र और गुरुओ की तरफ भागता है I लेकिन अभ्यास के द्वारा हमें इसको एक परमात्मा की याद में ही स्थित करना है।
राजयोग अभ्यास के लिए यह सोचना चाहिए कि- "मैं एक आत्मा हूँ, मैं ज्योति -बिंदु परमात्मा शिव की अविनाशी संतान हूँ। जो परमपिता ब्रह्मलोक के वासी है, शांति के सागर, आनंद के सागर प्रेम के सागर और सर्वशक्तिमान है --I" ऐसा मनन करते हुए मन को ब्रह्मलोक में परमपिता परमात्मा शिव पर स्थित करना चाहिए I
‘योग’ का अर्थ – ज्ञान के सागर, शान्ति के सागर, आनन्द के सागर, प्रेम के सागर, सर्व शक्तिवान, पतितपावन परमात्मा शिव के साथ आत्मा का सम्बन्ध जोड़ना है, ताकि आत्मा को भी शान्ति, आनन्द, प्रेम, पवित्रता, शक्ति और दिव्यगुणों की विरासत प्राप्त हो
यह सृष्टि ही घोर नरक बन गई है।इससे निकलकर हर कोई स्वर्ग में जाना चाहता है,लेकिन नरक से स्वर्ग की ओर का मार्ग कई रुकावटों से युक्त है।काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार उसके रास्ते में मुख्य बाधा डालते है।इन विकारों पर विजय प्राप्त करके मनुष्य से देवता बनने वाले ही नर-नार स्वर्ग में जा सकते है।
Revision Course 6 R
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छठे दिन के कोर्स का रिवीज़न
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आज के कोर्स के प्रमुख बिन्दु इस तरह से हैं-
भारत में गीता ज्ञान को भगवान द्वारा दिया हुआ ज्ञान माना जाता है, फिर भी सभी यही मानते है गीता ज्ञान श्रीकृष्ण ने द्वापर युग के अंत में युद्ध के मैदान में, अर्जुन के रथ पर सवार होकर दिया थाI
गीता-ज्ञान द्वापर युग में नही दिया गया बल्कि संगम युग में दिया गया I वास्तव में गीता-ज्ञान परमात्मा शिव ने दिया था और फिर गीता ज्ञान से सतयुग में श्रीकृष्ण का जन्म हुआI अत: गोपेश्वर परमपिता शिव श्रीकृष्ण के भी परलौकिक पिता है और गीता श्रीकृष्ण की भी माता है।
गीता में भगवान ने कहा है कि "मै अधर्म का विनाश तथा सत्यधर्म कि स्थापना के लिए ही अवतरित होता हूँ I" जो लोग यह मानते है कि भगवान ने गीता ज्ञान द्वापरयुग के अंत में दिया, उन्हें सोचना चाहिए कि क्या गीता ज्ञान देने और भगवान के अवतरित होने का यही फल हुआ ? क्या गीता ज्ञान देने के बाद अधर्म का युग प्रारम्भ हुआ ?
परमात्मा शिव ने इस सृष्टि रूपी कर्मक्षेत्र या कुरुक्षेत्र पर, प्रजापिता बह्मा (अर्जुन) के शरीर रूपी रथ में सवार होकर विकारो से ही युद्ध करने कि शिक्षा दी थी ,परन्तु लेखक ने बाद में अलंकारिक भाषा में इसका वर्णन किया तथा चित्रकारों ने बाद में शरीर को रथ के रूप में अंकित किया। बाद में वास्तविक अर्थ प्रायः विलुप्त हो गया I
परमपिता शिव के स्थान पर गीता-पुत्र श्रीकृष्ण देवता का नाम लिख देने के कारण गीता का ही खंडन हो गया और संसार में घोर अनर्थ और हाहाकार हो गया है।एक निराकार परमपिता की आज्ञा मन्मनाभव अर्थात एक मुझ को याद करो को भूलकर व्यभिचारी बुद्धि वाले हो गए है।
ब्रह्माकुमार दुसरों को भी शांति का मार्ग दर्शाना अपना कर्तव्य समझते है I ब्रह्माकुमार जन-जन को यह ज्ञान दे रहे है कि "शांति" पवित्र जीवन का एक फल है उसके लिए परमात्मा का परिचय जानना जरुरी हैI जिसके लिए राजयोग-केंद्र पर पधारने के लिए आमंत्रित करता है, जहाँ राजयोग के अभ्यास व इस कोर्स की जानकारी दी जाती है।
इस ज्ञान और योग को समझने का फल यह होता है कि कोई कार्यालय में काम कर रहा हो या रसोई में कार्यरत हो तो भी मनुष्य शांति के सागर परमात्मा के साथ स्वयं का सम्बन्ध स्थापित कर सकता है I इस सब का श्रेष्ठ परिणाम यह होता है कि सारा परिवार प्यार और शांति के सूत्र में बंध जाता है, दिव्य ज्ञान के द्वारा मनुष्य विकार तो छोड़ देता है और गुण धारण कर लेता है।
परमात्मा को याद करते समय हमे अपनी बुद्धि सब तरफ से हटाकर एक जोतिर्बिंदु परमात्मा शिव से जुटानी चाहिए। मन चंचल होने के कारण काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार अथवा शास्त्र और गुरुओ की तरफ भागता है I लेकिन अभ्यास के द्वारा हमें इसको एक परमात्मा की याद में ही स्थित करना है
राजयोग अभ्यास के लिए यह सोचना चाहिए कि- "मैं एक आत्मा हूँ, मैं ज्योति -बिंदु परमात्मा शिव की अविनाशी संतान हूँ। जो परमपिता ब्रह्मलोक के वासी है, शांति के सागर, आनंद के सागर प्रेम के सागर और सर्वशक्तिमान है --I" ऐसा मनन करते हुए मन को ब्रह्मलोक में परमपिता परमात्मा शिव पर स्थित करना चाहिए I
हमारा योग नही लगता इसका एक कारण तो यह है कि "आत्म-निश्चय" में स्थित न हो पाना।दूसरी बात परमात्मा को नाम-रूप से न्यारा व सर्वव्यापी मानना,अत: वे मन को कोई ठिकाना भी नही दे सकतेI तीसरी कि उन्हें परमात्मा के साथ अपने घनिष्ट सम्बन्ध का भी परिचय नही है, इसी कारण परमात्मा के प्रति उनके मन में घनिष्ठ स्नेह नही।
योग’ का अर्थ –
ज्ञान के सागर, शान्ति के सागर, आनन्द के सागर, प्रेम के सागर, सर्व शक्तिवान, पतितपावन परमात्मा शिव के साथ आत्मा का सम्बन्ध जोड़ना है, ताकि आत्मा को भी शान्ति, आनन्द, प्रेम, पवित्रता, शक्ति और दिव्यगुणों की विरासत प्राप्त हो
योग की उच्च स्थिति इन चार आधारभूत स्तम्भों पर टिकी होती है :-
ब्रह्मचर्य:-
योगी शारीरिक सुंदरता या वासना-भोग की और आकर्षित नहीं होता,क्योंकि उसका दृष्टि कोण बदल चुका होता है। वह आत्मा की सुंदरता को ही पूर्ण महत्व देता है। उसका मन ब्रह्म में स्थित होता है और वह देह की अपेक्षा आत्माभिमानी अवस्था में रहता है।
सात्विक आहार:-
मनुष्य जो आहार करता है उसका उसके मस्तिष्क पर गम्भीर प्रभाव पड़ता है।इसलिए योगी मांस, अंडे उत्तेजक पेय या तम्बाकू नहीं लेता।अपना पेट पालने के लिए वह अन्य जीवों की हत्या नहीं करता, न ही वह अनुचित साधनों से धन कमाता है।
सत्संग:-
जैसा संग वैसा रंग’ इस कहावत के अनुसार योगी सदा इस बात का ध्यान रखता है कि उसका सदा ‘सत्-चित-आनन्द’ स्वरूप परमात्मा के साथ ही संग बना रहे। वह कभी भी कुसंग में अथवा अश्लील साहित्य अथवा कुविचरों में अपना समय व्यर्थ नहीं गंवाता।
दिव्यगुण:-
योगी सदा अन्य आत्माओं को भी अपने दिव्य-गुणों, विचारों तथा दिव्य कर्मो की सुगंध से अगरबत्ती की तरह सुगन्धित करता रहता है, न कि आसुरी स्वभाव, विचार व कर्मो के वशीभूत होता है।
राजयोग के निरंतर अभ्यास से मनुष्य को अनेक प्रकार की शक्तियाँ प्राप्त होती है। इन शक्तियों के द्वारा ही मनुष्य सांसारिक रुकावटों को पार करता हुआ आध्यात्मिक मार्ग की ओर अग्रसर होता है।वे शक्तियां हैं-
सिकोड़ने की शक्ति समेटने की शक्ति सहन शक्ति समाने की शक्ति इसके साथ परखने निर्णय सामना तथा सहयोग करने की शक्ति का भी विकास होता है।
यह सृष्टि ही घोर नरक बन गई है।इससे निकलकर हर कोई स्वर्ग में जाना चाहता है,लेकिन नरक से स्वर्ग की ओर का मार्ग कई रुकावटों से युक्त है। काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार उसके रास्ते में मुख्य बाधा डालते है।
संगम युग में परमात्मा शिव जो सहज राजयोग की शिक्षा प्रजापिता ब्रह्मा के द्वारा दे रहे है, उसे धारण करने से ही मनुष्य इन प्रबल शत्रुओं (५ विकारों) को जीत सकता है।
इन विकारों पर विजय प्राप्त करके मनुष्य से देवता बनने वाले ही नर-नार स्वर्ग में जा सकते है, वरना हर एक व्यक्ति के मरने के बाद जो यह लिख दिया जाता है कि ‘वह स्वर्गवासी हुआ’, यह सरासर गलत है।
यदि हर कोई मरने के बाद स्वर्ग जा रहा होता तो जन-संख्या कम हो जाती और स्वर्ग में भीड़ लग जाती और मृतक के सम्बन्धी मातम न करते।
ॐ शांति
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